________________ प्रथम प्रनिपत्ति : पृथ्वीकाय का वर्णन [41 अर्घ-नाराच-जिसमें एक तरफ मर्कटबन्ध हो और दूसरी ओर कीलिका हो, वह अर्धनाराच है। कीलिका-जिसमें हड्डियाँ कील से जुड़ी हों। सेवार्त (छेदति)-जिसमें हड्डियाँ केवल आपस में जुड़ी हुई हों (कीलक आदि का बन्ध भी न हो) वह सेवात या छेदति संहनन है। प्रायः मनुष्यादि के यह संहनन होने पर तेलमालिश आदि की अपेक्षा रहती है। उक्त प्रकार के छह संहननों में से सूक्ष्म पृथ्वीकायिक के अन्तिम छेदवति या सेवात संहनन कहा गया है / यद्यपि सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों के औदारिक शरीर में हड्डियां नहीं होती हैं फिर भी हड्डी होने की स्थिति में जो शक्ति-विशेष होती है वह उनमें है, अतः उनको उपचार से संहनन माना है। सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों के औदारिक शरीर तो है, उस शरीर के कारण से सूक्ष्म शक्ति-विशेष तो होती ही है। 4. संस्थानद्वार-संस्थान का अर्थ है-आकृति / ये संस्थान छह बताये गये हैं। 1 समचतुरस्रसंस्थान, 2 न्यग्रोध-परिमंडलसंस्थान, 3 सादिसंस्थान, 4 कुब्जसंस्थान, 5 वामनसंस्थान, 5 हुंडसंस्थान / 1. समचतुरस्त्र-पालथी मार कर बैठने पर जिस शरीर के चारों कोण समान हों। दोनों जानुओं, दोनों स्कन्धों का अन्तर समान हो, वाम जानु और दक्षिण स्कन्ध, वाम स्कन्ध और दक्षिण जानु का अन्तर समान हो, आसन से कपाल तक का अन्तर समान हो, ऐसी शरीराकृति को समचतुरस्रसंस्थान कहते हैं / अथवा सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार जिस शरीर के सम्पूर्ण अवयव ठीक प्रमाण वाले हों, वह समचतुरस्र है। 2. न्यग्रोधपरिमंडल-न्यग्रोध का अर्थ वटवृक्ष है। वटवृक्ष की तरह जिस शरीर का नाभि से ऊपर का हिस्सा पूर्ण हो और नीचे का भाग हीन हो वह न्यग्रोधपरिमंडल है / 3. सादि-यहाँ सादि से अर्थ नाभि से नीचे के भाग से है। जिस शरीर में नाभि से नीचे का भाग पूर्ण हो और ऊपर का भाग हीन हो वह सादिसंस्थान है। 4. कुब्ज-जिस शरीर में हाथ, पैर, सिर आदि अवयव ठीक हों परन्तु छाती, पीठ, पेट हीन और टेढ़े हों, वह कुब्जसंस्थान है / 5. वामन-जिस शरीर में छाती, पीठ, पेट आदि अवयव पूर्ण हों परन्तु हाथ, पैर आदि अवयव छोटे हों वह वामनसंस्थान है / 6. हुंड-जिस शरीर के सब अवयव हीन, अशुभ और विकृत हों, वह हुंडसंस्थान है। उक्त छह संस्थानों से सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों के कौनसा संस्थान है, इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि उनका संस्थान मसूर की दाल जैसा चन्द्राकार संस्थान है। चन्द्राकार मसूर की दाल जैसा संस्थान हुंडकसंस्थान ही है। अन्य पाँच संस्थानों में यह प्राकार नहीं हो सकता। अतः हुंडसंस्थान में ही यह समाविष्ट होता है। जीवों के छह संस्थानों के अतिरिक्त तो और कोई संस्थान नहीं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org