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________________ [जीवाजीवाभिगमसूत्र प्राप्त हो जाती है, उसका हेतु भी तेजस्शरीर है।' यह सभी संसारी जीवों के होता है। कार्मणशरीर-आत्मप्रदेशों के साथ क्षीर-नीर की तरह मिले हुए कर्मपरमाणु ही शरीर रूप से परिणत होकर कार्मणशरीर कहलाते हैं / कर्म-समूह ही कार्मणशरीर है / यह अन्य सब शरीरों का मूल है / कार्मण के होने पर ही शेष शरीर होते हैं / कार्मण के उच्छेद होते ही सब शरीरों का उच्छेद हो जाता है। जीव जब अन्य गति में जाता है तब तेजस् सहित कार्मण शरीर ही उसके साथ होता है। सक्षम होने के कारण यह तेजस-कार्मण शरीर गत्यन्तर में जाता-पाता दष्टिगोचर नहीं होता। इस विषय में अन्यतीथिक भी सहमत हैं। उन्होंने कहा है कि-गत्यन्तर में जाता-प्राता हुआ यह शरीर सूक्ष्म होने से दृष्टिगोचर नहीं होता। दृष्टिगोचर न होने से उसका प्रभाव नहीं मानना चाहिए। उक्त पांच शरीरों में से सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों के तीन शरीर होते हैं----ौदारिक, तैजस और कार्मण / वैक्रिय और आहारक उनके नहीं होते / क्योंकि ये दोनों लब्धियां हैं और भवस्वभाव से ही वे जीव इन लब्धियों से वंचित होते हैं। 2. अवगाहनाद्वार-शरीर की ऊँचाई को अवगाहना कहते हैं। यह दो प्रकार को होती है-जघन्य और उत्कृष्ट / सूक्ष्मपृथ्वीकायिक जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है और उत्कृष्ट भी अंगुल का असंख्यातवाँ भाग ही है, परन्तु जघन्य पद से उत्कृष्ट पद में अपेक्षाकृत अधिक अवगाहना जाननी चाहिए। 3. संहननद्वार-हड्डियों की रचनाविशेष को संहनन कहते हैं। वे छह हैं-वज्र ऋषभनाराच, ऋषभनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलिका और सेवार्त। वज्रऋषभनाराच-वज्र का अर्थ कीलिका है। ऋषभ का अर्थ परिवेष्टनपट्ट है और नाराच का अर्थ दोनों तरफ मर्कटबन्ध होना है / तात्पर्य यह हुआ कि दो हड्डियाँ दोनों ओर से मर्कटबन्ध से जुड़ी हों, ऊपर से तीसरी हड्डीरूप पट्टे से वेष्टित हों और ऊपर से तीनों अस्थियों को भेदता हा कीलक हो। इस प्रकार की मजबूत हड्डियों की रचना को वनऋषभनाराचसंहनन कहते हैं। ऋषभनाराच-जिसमें मर्कटबन्ध हो, पट्ट हो लेकिन कीलक न हो, ऐसी अस्थिरचना को ऋषभनाराच कहते हैं। नाराच-जिसमें मर्कटबन्ध से ही हड्डियाँ जुड़ी हों वह नाराचसंहनन है। 1. सव्वस्स उम्हासिद्धं रसाइ पाहारपाकजण गं च / तेजगलद्धिनिमित च तेयगं होइ नायव्वं / 2. कम्मविकारो कम्मट्टविह विचित्तकम्मनिष्फन / सम्वेसि सरीराणां कारणभूयं मुणेयन्वं / / 3. अन्तरा भवदेहोऽपि सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यते / निष्क्रामन् प्रविशन् वाऽपि नाभावोऽनोक्षणादपि // Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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