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________________ प्रथम प्रतिपत्ति : पृथ्वीकाय का वर्णन] [29 अपर्याप्त जीव भी दो प्रकार के हैं-१. लब्धि-अपर्याप्त और 2. करण-अपर्याप्त / जिस जीव ने स्वयोग्य पर्याप्तियां पूरी नहीं की और आगे करेगा भी नहीं अर्थात् अपर्याप्त ही मरेगा वह लब्धिअपर्याप्त है / जिसने स्वयोग्य पर्याप्तियों को पूरा नहीं किया किन्तु आगे पूरा करेगा वह करण से अपर्याप्त है। इस प्रकार सूक्ष्म पृथ्वोकायिक जीवों के पर्याप्तक और अपर्याप्तक के भेद से दो प्रकार हए / सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों के सम्बन्ध में शेष वक्तव्यता कहने के लिए दो संग्रहणी गाथाएँ यहाँ दी गई हैं, वे इस प्रकार हैं सरीरोगाहण संघयण संठाण कसाय तह य हंति सन्नाओ। लेसिदिय समुग्धाए सन्नी बेए य पज्जत्ती // 1 // विट्ठी सण नाणे जोगुवनोगे तहा किमाहारे / उबवाय ठिई समुग्घाय चवण गइरागई चेव // 2 // इसके आगे सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों का 23 द्वारों द्वारा निरूपण किया जायेगा। वे तेवीस द्वार इस प्रकार हैं 1. शरीर, 2. अवगाहना, 3. संहनन, 4. संस्थान, 5. कषाय, 6. संज्ञा, 7. लेश्या, 8. इन्द्रिय, 9. समुद्घात, 10. संजी-असंज्ञी, 11. वेद. 12. पर्याप्ति, 13. दृष्टि, 14. दर्शन, 15. ज्ञान, 16. योग, 17. उपयोग, 18. आहार, 19. उपपात, 20. स्थिति, 21. समवहत-असमवहत मरण 22. च्यवन और 13. गति-प्रागति / आगे के सूत्रों में क्रमश: इन 23 द्वारों को लेकर प्रश्नोत्तर किये गये हैं। 'यथोद्देशः तथा निर्देशः' के अनुसार प्रथम क्रमशः शरीर आदि द्वारों का कथन किया जाता है-~ 13. [1] तेसि णं भंते ! जीवाणं कति सरीरया पण्णता ? गोयमा ! तो सरीरगा पण्णता, तंजहा-ओरालिए, तेयए, कम्मए / [1] हे भगवन् ! उन सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों के कितने शरीर कहे गये हैं ? गौतम ! तीन शरीर कहे गये हैं, जैसे कि 1. औदारिक 2. तैजस और 3. कार्मण। [2] तेसि णं भंते ! जीवाणं केमहालिया सरीरोगाहणा पण्णता? गोयमा ! जहन्नेणं अंगुलासंखेज्जहभागं उक्कोसेणवि अंगुलासंखेज्जइभागं / [2] भगवन् ! उन जीवों के शरीर की अवगाहना कितनी बड़ी कही गई है ? गौतम ! जघन्य से अंगुल का असंख्यातवां भाग और उत्कृष्ट से भी अंगुल का असंख्यातवां भाग प्रमाण है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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