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________________ 28] [जीवाजीवाभिगमसूत्र पर्याप्तियों का क्रम और काल-सब पर्याप्तियों का पारंभ एक साथ होता है किन्तु उनकी पूर्णता अलग-अलग समय में होती है / पहले आहारपर्याप्ति पूर्ण होती है, फिर क्रमशः शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मनःपर्याप्ति पूर्ण होती है / पूर्व की अपेक्षा उत्तर-उत्तर की पर्याप्ति सूक्ष्म, सूक्ष्मतर होती है। जैसे छह व्यक्ति एक साथ सूत कातने बैठे हों लो जो बारीक कातेगा उसे उसकी अपेक्षा अधिक समय लगेगा जो मोटा कातता है / प्राहारपर्याप्ति सबसे स्थूल है और मनःपर्याप्ति सबसे सूक्ष्म है। आहारपर्याप्ति का काल एक समय है। वह एक समय में पूर्ण हो जाती है। इसका प्रमाण यह है कि प्रज्ञापना के आहार पद में यह पाठ है कि 'आहारपर्याप्ति से अपर्याप्त जीव आहारक है या अनाहारक ? उत्तर में कहा गया है कि प्राहारक नहीं है, अनाहारक है। प्राहारपर्याप्ति से अपर्याप्तजीव विग्रहगति में ही होता है, उपपातक्षेत्र में पाया हुया नहीं। उपपातक्षेत्र समागत जीव. प्रथम समय में ही आहारक होता है। इससे पाहारपर्याप्ति की समाप्ति का काल एक समय का सिद्ध होता है। यदि उपपातक्षेत्र में आने के बाद भी आहारपर्याप्ति से अपर्याप्त होता तो प्रज्ञापना में 'कदाचित् आहारक और कदाचित् अनाहारक' ऐसा उत्तर दिया गया होता / जैसा कि शरीरादि पर्याप्तियों में दिया गया है / इसके बाद शरीर आदि पर्याप्तियाँ अलग-अलग एक-एक अन्तर्मुहूर्त में पूरी होती हैं। सब पर्याप्तियों का समाप्तिकाल भी अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है क्योंकि अन्तर्मुहूर्त भी अनेक प्रकार का है। किसके कितनी पर्याप्तियां ? एकेन्द्रिय जीवों के चार पर्याप्तियाँ होती हैं-१. पाहार, 2. शरीर, 3. इन्द्रिय और 4. श्वासोच्छ्वास / द्वीन्द्रिय, वीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रिय के पांच पर्याप्तियाँ होती हैं-पूर्वोक्त चार और भाषापर्याप्ति / संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के छहों पर्याप्तियाँ होती हैं। आहार, शरीर और इन्द्रिय—ये तीन पर्याप्तियाँ प्रत्येक जीव पूर्ण करता है / इनको पूर्ण करके ही जीव अगले भव की प्रायू का बंध कर सकता है। अगले भव की आय का बंध किये बिना कोई जीव नहों मर सकता / इन तीन पर्याप्तियों की अपेक्षा से तो प्रत्येक जीव पर्याप्त ही होता है परन्तु पर्याप्तअपर्याप्त का विभाग इन तीन पर्याप्तियों की अपेक्षा से नहीं है, अपितु जिन जीवों के जितनी पर्याप्तियाँ कही गई हैं, उनकी पूर्णता-अपूर्णता को लेकर है / ___ स्वयोग्य पर्याप्तियों को जो पूर्ण करे वह पर्याप्त जीव हैं और स्वयोग्य पर्याप्तियों को पूर्ण न करे वह अपर्याप्त जीव हैं। जैसे एकेन्द्रिय जीव के स्वयोग्य पर्याप्तियाँ 4 कही गई हैं / इन चार पर्याप्तियों को पूर्ण करनेवाला एकेन्द्रिय जीव पर्याप्त है और इन चार को पूर्ण न करने वाला अपर्याप्त है। पर्याप्त-अपर्याप्त के भेद पर्याप्त जीव दो प्रकार के हैं.---१. लब्धिपर्याप्त और 2. करणपर्याप्त। जिस जीव ने स्वयोग्य पर्याप्तियों को अभी पूर्ण नहीं किया किन्तु आगे अवश्य पूरी करेगा, वह लब्धि की अपेक्षा से लब्धि-पर्याप्तक कहा जाता है / जिस जीव ने स्वयोग्य पर्याप्तियां पूरी कर ली हैं बह करणपर्याप्त है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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