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________________ [जीवाजीचाभिगमन सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में कहना चाहिए कि वे असंख्यात हैं अतः समय-समय में एक-एक का अपहार करने का क्रम पल्योपम के असंख्यातवें भाग तक चलता रहे तो भी उनका अपहार पूरा नहीं हो सकता / (यह अपहार कभी हुअा नहीं, होगा नहीं, केवल संख्या बताने के लिए कल्पनामात्र है।) 201. (ई) सोहम्मीसाणेसु णं भंते ! कप्पेस देवाणं के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता? गोयमा ! विहा सरीरा पण्णत्ता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरखेउम्बिया य / तत्थ णं जे से भवधारणिज्जे से जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागो, उक्कोसेणं सत्तरयणीओ। तत्थ णं जे से उत्तरवेउम्बिए से जहन्नेणं अंगुलस्स संखेज्जइ भागो, उक्कोसेणं जोयणसयसहस्सं / एवं एक्केक्का ओसारेत्ताणं जाव अणुत्तराणं एक्का रयणी। गेवेज्जणुत्तराणं एगे भवधारणिज्जे सरीरे उत्तरवेउब्धिया णत्थि / सोहम्मीसाणेस णं भंते ! देवाणं सरीरगा कि संघयणी पण्णता? गोयमा ! छहं संघयणाणं प्रसंघयणी पण्णत्ता / नेवट्ठि नेव छिरा वि हारू णेव संघयणमस्थि; जे पोग्गला इट्ठा कंता जाव एएसि संघायत्ताए परिणमंति जाव अणुसरोववाइया / सोहम्मीसाणेस णं भंते ! देवाणं सरीरगा किसंठिया पण्णता ? गोयमा ! दुविहा सरीरा, भवधारणिज्जा य उत्तरवेउब्विया य। तत्थ णं जे से भवधारणिज्जा ते समचउरंससंठाणसंठिया पण्णता / तत्थ गंजे से उत्तरवेउब्बिया ते णाणासंठाणसंठिया पण्णत्ता जाव अच्चुनो। अवेउविया गेवेज्जणुत्तरा भवधारणिज्जा समचउरंससंठाणसंठिया, उत्तरवेउब्विया णस्थि / सोहम्मीसाणेसु देवा केरिसया वणेणं पण्णता ? गोयमा ! कणगत्तयरत्तामा वण्णणं पण्णत्ता। सणंकुमारमाहिदेसु णं पउमपम्हगोरा वण्णणं पण्णत्ता। बंभलोए णं भंते !* गोयमा ! अल्लमधुगवण्णाभा / एवं जाव गेवेज्जा / अणुत्तरोववाइया परमसुक्किल्ला वणेणं पण्णत्ता। सोहम्मीसाणेसु णं भंते ! कप्पेसु देवाणं सरीरगा केरिसया गंधेणं पण्णता ? गोयमा ! से जहाणामए कोटपुडाण वा तहेव सव्वं मणामतरगा चेव गंधेणं पण्णत्ता। जाव अणुतरोववाइया / सोहम्मीसाणेसु णं भंते ! देवाणं सरीरगा केरिसया फासेणं पण्णत्ता? बोपमा ! थिरमउयणिसुकुमालछवि फासेणं पण्णत्ता, एवं जाव अणुत्तरोववाइया / सोहम्मीसाणदेवाणं केरिसया पोग्गला उस्सासत्ताए परिणमंति ? गोयमा ! जे पोग्गला इट्ठा कता जाव एएसि उस्सासत्ताए परिणमंति जाव अनुत्तरोषवाइया; एवं प्राहारत्ताएवि जाव पतरोववाइया। सोहम्मीसाणदेवाणं कइ लेस्साओ? गोयमा! एगा तेउलेस्सा पण्णत्ता। सणंकुमारमाहिदेसु एगा पम्हलेस्सा। एवं बंभलोएवि पम्हा, सेसेसु एक्का सुक्कलेस्सा; अणुत्तरोववाइयाणं एक्का परमसुक्कलेस्सा। सोहम्मीसाणदेवा कि सम्भट्ठिी, मिच्छादिट्ठी, सम्मामिच्छाविट्ठी ? तिण्णिवि, जाप अंतिमगेवेज्जादेवा सम्मविट्ठीवि मिच्छाविट्ठीवि सम्मामिच्छाविट्ठीवि / अणुत्तरोववाइया सम्मविट्ठी, नो मिच्छादिट्ठी नो सम्मामिच्छादिट्ठी। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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