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________________ 10] [औपपातिकसूत्र फलमंते, बीयमंते, अणुपुखसुजायरइलवट्ट भावपरिणए, एक्कखंधे, अणेगसाले, अणेगसाहप्पसाहविडिने, अणेगनरवामसुष्पसारिय-अम्गेज्नघणविउलबद्धखंधे, अच्छिद्दपत्ते, अविरलपत्ते, प्रवाईणपत्ते,-अणईअपत्ते, नियजरढपंडुपत्ते, णव-हरिय-भिसंत-पत्तभारंधयारगंभीरदरिसणिज्जे, उणिग्गय-णव-तरुण-पत्तपल्लव-कोमलउज्जलचलंत-किसलय-सुकुमालपवाल-सोहियवरंकुरग्गसिहरे, णिच्चं कुसुमिए, णिच्चं माइए, णिच्चं लवइए, पिच्चं थवइए, णिच्चं गुलइए, णिच्चं गोच्छिए, णिच्चं जमलिए, णिच्चं जुलिए, णिच्चं विणमिए, णिच्चं पणमिए, णिच्चं कुसुमिय-माइय-लवइय-थवइय-गुलइय-गोच्छियजमलिय-जुवलिय-विणमिय-पणमिय-सुविभत्तपिंडमंजरिडिसयधरे, सुय-बरहिण-मयणसाल-कोइलकोभगक-भिगारग-कोंडलग-जीवंजीवग-गंदीमुह कविलपिंगलक्खग - कारंड-चक्कवाय-कलहंस - सारसअणेगसउणिगणमिहुणविरइयसदुण्णइयमहुरसरणाइए, सुरम्मे, संपिडिय-दरिय-भमर-महयरिपहकरपरिलितमत्तछप्पयकुसुमासवलोलमहुरगुमगुमंतगुजंतदेसभाए, अभितर-पुरफफले, बाहिरपत्तोच्छण्णे, पत्तेहि य पुष्फेहि य प्रोच्छन्नवालिच्छण्णे, साउफले, निरोयए, अकंटए, णाणाविहगुच्छगुम्ममंडवगरम्मसोहिए विचित्तसुहकेउभूए वावीपुक्खरिणीदीहियासु य सुनिवेसिय-रम्मजालहरए पिडिमणीहारिमं सुधि सुहसुरभिमणहरं च मया गंधद्धणि मुयंते, गाणाविहगुच्छ-गुम्म-मंडवग-घरगसुहसेउकेउबहुले, प्रणेगरह-जाण-जुग्ग-सिविय-परिमोयणे), सुरम्मे, पासादीए, दरिसणिज्जे अभिरूबे, पडिलवे // ५-उस वन-खण्ड के ठीक बीच के भाम में एक विशाल एवं सुन्दर अशोक वृक्ष था। उसकी जड़ें डाभ तथा दूसरे प्रकार के तृणों से विशुद्ध-रहित थीं। (वह वृक्ष उत्तम मूल जड़ों के ऊपरी भाग, कन्द-भीतरी भाग, जहाँ से जड़ें फूटती हैं; स्कन्ध-तना, छाल, शाखा, प्रवाल- अंकुरित होते पत्ते, पत्र, पुष्प, फल तथा बीज सम्पन्न था। वह क्रमशः ग्रानुपातिक रूप में सुन्दर तथा गोलाकार विकसित था / उसके एक-अविभक्त तना तथा अनेक शाखाएँ थीं। उसका मध्य भाग अनेक शाखाओं और प्रशाखायों का विस्तार लिये हए था। उसका सघन, विस्तृत तथा संघ त तथा सुघड़ तना अनेक मनष्यों द्वारा फैलाई हुई भुजाओं से भी गहीत नहीं किया जा सकता था---धेरा नहीं जा सकता था। उसके पत्ते छेदरहित, अविरल धने--एक दूसरे से मिले हुए, अधोमुख नीचे की ओर लटकते हुए तथा उपद्रव-रहित थे। उसके पुराने, पीले पत्ते झड़ गये थे। नये, हरे, चमकीले पत्तों की सघनता से वहाँ अंधेरा तथा गम्भीरता दिखाई देती थी। नवीन, परिपुष्ट पत्तों, कोमल, उज्ज्वल तथा हिलते हुए किसलयों-पूरी तरह नहीं पके हुए पत्तों, प्रवालों ताम्र वर्ण के नये निकलते पत्तों से उसका उच्च शिखर सुशोभित था। वह सब ऋतुओं में फूलों, मंजरियों, पत्तों, फूलों के गुच्छों, गुल्मों-लता-कुजों तथा पत्तों के गुच्छों से युक्त रहता था। वह सदा समश्रेणिक तथा युगल-रूप में-दो-दो के जोड़ के बीच अवस्थित था / वह पुष्प, फल आदि के भार से सदा विनमित-बहुत झुका हुआ, प्रणमित-विशेष रूप से अभिनत-नमा हुआ था। यों विविध प्रकार से अपनी विशेषताएँ लिये हुए वह वृक्ष अपनी सुन्दर लुम्बियों तथा मंजरियों के रूप में मानो शिरोभूषण-कलंगियाँ धारण किये रहता था। तोते, मोर, मैना, कोयल, कोभगक, भिंगारक, कोण्डलक, चकोर, नन्दिमुख, तीतर, बटेर, बतख, चक्रवाल, कलहंस, सारस प्रभति पक्षियों द्वारा की जाती अावाज के उन्नत एवं मधुर स्वरालाप से वह गुजित था, सुरम्य प्रतीत होता था। वहाँ स्थित मदमाते भ्रमरों तथा भ्रमरियों या मधुमक्खियों के समूह एवं पुष्परस--मकरन्द के लोभ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003480
Book TitleAgam 12 Upang 01 Auppatik Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1992
Total Pages242
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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