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________________ अष्टम अध्ययन ] [ 47 एकाकी होकर, डाभ के संथारे पर स्थित होकर, तेला की तपस्या ग्रहण करके, हरिणैगमेषी देव का मन में पुनः पुनः चिन्तन करने लगे। तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव का अष्टम भक्त तप प्रायः पूर्ण होने आया, तब हरिणैगमेषी देव का आसन चलायमान हुा / अपने प्रासन को चलित हुआ देखकर उसने अवधिज्ञान का उपयोग लगाया। तब हरिणैगमेषी देव को इस प्रकार का यह आन्तरिक विचार उत्पन्न होता है-"जम्बूद्वीप नामक द्वीप में, भारतवर्ष में दक्षिणार्ध भरत में द्वारका नगरी में, पौषधशाला में, कृष्ण वासुदेव अष्टमभक्त ग्रहण करके मन में पुनः पुनः मेरा स्मरण कर रहा है, अतएव म समीप प्रकट होना (जाना) योग्य है।" देव इस प्रकार विचार करके उत्तरपूर्व दिग्भाग (ईशान कोण) में जाता है और वैक्रियसमुद्घात करता है कार्थात् उत्तर वैक्रिय शरीर बनाने के लिये जीवप्रदेशों को बाहर निकालता है। जीव-प्रदेशों को बाहर निकालकर संख्यात योजन का दंड बनाता है। वह इस प्रकार—(१) कर्केतन रत्न, (2) बज्ररत्न, (3) वैडूर्य रत्न, (4) लोहिताक्ष रत्न, (5) मसारगल्ल रत्न, (6) हंसगर्भ रत्न, (7) पुलक रत्न, (8) सौगंधिक रत्न, (6) ज्योतिरस रत्न, (10) अंक रत्न, (11) अंजन रत्न, (12) रजत रत्न, (13) जातरूप रत्न, (14) अंजनपुलक रत्न, (15) स्फटिक रत्न, (16) रिष्ट रत्न-इन रत्नों के यथाबादर अर्थात् असार पुद्गलों का त्याग करता है और यथासूक्ष्म अर्थात् सारभूत पुद्गलों को ग्रहण करता है। ग्रहण करके (उत्तर वैक्रिय शरीर बनाता है) फिर कृष्ण वासुदेव पर अनुकंपा करते हुए उस देव ने अपने रत्नों के उत्तम विमान से निकलकर पृथ्वीतल पर जाने के लिये शीघ्र ही गति का प्रचार किया, अर्थात वह शीघ्रतापूर्वक चल पड़ा। उस समय चलायमान होते हुए निर्मल स्वर्ण के प्रतर जैसे कर्णपूर और मुकुट के उत्कट आडम्बर से वह दर्शनीय लग रहा था। अनेक मणियों, सुवर्ण और रत्नों के समूह से शोभित और विचित्र रचना वाले पहने हुए कटिसूत्र से उसे हर्ष उत्पन्न हो रहा था। हिलते हए श्रेष्ठ और मनोहर कंडलों से उज्ज्वल मख की दीप्ति से उसका रूप बडा ही सौम्य हो गया। कार्तिको पूर्णिमा की रात्रि में, शनि और मंगल के मध्य में स्थित और उदयप्राप्त शारद-निशाकर के समान वह देव दर्शकों के नयनों को आनन्द दे रहा था। तात्पर्य यह है कि शनि और मंगल ग्रह के समान चमकते हुए दोनों कुण्डलों के बीच में उसका मुख शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान शोभायमान हो रहा था। दिव्य अोषधियों (जड़ी-बूटियों) के प्रकाश के समान मुकुट आदि के तेज से देदीप्यमान, रूप से मनोहर, समस्त ऋतुओं की लक्ष्मी से वृद्धिगत शोभावाले तथा प्रकृष्ट गंध के प्रसार से मनोहर मेरु पर्वत के समान वह देव अभिराम प्रतीत होता था। उस देव ने ऐसे विचित्र वेष की विक्रिया की / वह असंख्य-संख्यक और असंख्य नामों वाले द्वीपों और समुद्रों के मध्य में होकर जाने लगा। अपनी विमल प्रभा से जीवलोक को तथा नगरवर द्वारका नगरी को प्रकाशित करता हुआ दिव्य रूपधारी देव कृष्ण वासुदेव के पास आ पहुँचा। तत्पश्चात् दश के आधे अर्थात् पाँच वर्णवाले तथा घुघरूवाले उत्तम वस्त्रों को धारण किया हुया वह देव आकाश में स्थित होकर [कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोला- (यह एक प्रकार का गम (पाठ) है। इसके स्थान पर दूसरा भी पाठ है जो इस प्रकार है-] वह देव उत्कृष्ट त्वरावाली, कायिक चपलता वाली, अति उत्कर्ष के कारण उद्धत, शत्रु को जीतने वाली होने से जय करने वाली, निपुणता वाली और दिव्य देवगति से जहाँ जंबूद्वीप था, जहाँ भारतवर्ष था और जहाँ दक्षिणार्थ भरत था, वहीं आता है, आकर के आकाश में स्थित होकर पाँच वर्णवाले एवं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003476
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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