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________________ अष्टम अध्ययन ] [45 णस्सिया हरिसवस-विसप्पमाणहियया] भवह, किण्णं अम्मो ! अज्ज तुब्भे ओहयमणसंकप्पा जाव [करयलपल्हत्थमुही अट्टझाणोवगया] झियायह ? तए णं सा देवई देवी कण्हं वासुदेवं एवं क्यासी-एवं खलु अहं पुत्ता! सरिसए जाव' नलकुब्बरसमाणे सत्त पुत्ते पयाया, नो चेव णं मए एगस्स वि बालत्तणे अणुभूए / तुम पि य णं पुत्ता! छह-छहं मासाणं ममं अंतियं पायवंदए हव्वमागच्छसि / तं धण्णाश्रो णं तानो अम्मयानो जाव' झियामि। तए णं से कण्हे वासुदेवे देवइं देवि एवं वयासी—मा णं तुब्भे अम्मो! अोहयमणसंकप्पा जाव: झियायह / अहण्णं तहा जतिस्सामि जहा णं ममं सहोदरे कणीयसे भाउए भविस्सति त्ति कटु देवई देवि ताहि इहाहि वहि समासासेइ / तो पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता जहा अभयो। नवरं हरिणेगमेसिस्स अट्ठमभत्तं पगेण्हइ जाव [पगेण्हइत्ता पोसहसालाए पोसहिए बंभयारिस्स उम्मुक्कमणिसुवण्णस्स ववगयमालावनगविलेवणस्स निक्खित्तसत्थमुसलस्स एगस्स अबीयस्स दाभसंथारोवगयस्स अटठमभत्तं परिगिण्हित्ता हरिणेगमेसि देवं मणसि करेमाणे करेमाणे चिट्ठ / तए णं तस्स कण्हस्स वासुदेवस्स अट्ठमभत्ते परिणममाणे हरिणेगमेसिस्स देवस्स प्रासणं चलइ / तए णं हरिणेगमेसी देवे पासणं चलियं पासइ, पासित्ता, प्रोहि पउंजति / तए णं तस्स हरिणेगमे सिस्स देवस्स अयमेयारूवे अज्झथिए चितिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था एवं खलु जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे बारवई नयरीए पोसहसालाए कण्हे नामं वासुदेवे अट्ठमभत्तं परिगिहित्ता णं मम मणसि करेमाणे करेमाणे चिट्ठइ / तं सेयं खलु मम कण्हस्स वासुदेवस्स अंतिए पाउभवित्तए।" एवं संपेहेइ, संपेहित्ता उत्तरपुरच्छिमं दिसीमागं प्रवक्कमति, प्रवक्कमित्ता विउव्वियसमुग्धाएणं समोहणति, समोहणित्ता संखेज्जाई जोयणाई दंडं निसिरइ / तं जहा-- (1) रयणाणं, (2) वइराणं, (3) वेरुलियाणं, (4) लोहियक्खाणं, (5) मसारगल्लाणं, (6) हंसगम्भाणं, (7) पुलगाणं, (8) सोगंधियाणं, (9) जोइरसाणं, (10) अंकाणं, (11) अंजणाणं, (12) रययाणं, (13) जायरूवाणं, (14) अंजणपुलयाणं, (15) फलिहाणं, (16) रिट्ठाणं अहाबायरे पोग्गले परिसाडेइ, परिसाडित्ता अहासहुमे पोग्गले परिगिण्हत्ति, परिगिण्हइत्ता कण्हमणुकंपमाणे देवे तो विमाणवरपुण्डरियानो रयणुत्तमानो धरणियलगमणतुरिय-संजणितगयणपयारो वाघुणितविमलकणगययरगडिसगमउडुक्कडाडोवदंसिणिज्जो, प्रणेगमणि-कणग-रयण-पहकरपरिमंडितभत्तिचित्तविणिउत्तमगुणजणियहरिसे, खोलमाणवरललितकुडलुज्जलियवयणगुणजनितसोमवे, उदितो विव कोमदीनिसाए सणिच्छरंगारउज्जलियमझभागत्थे णयणाणंदो, सरयचंदो, दिव्वोसहिपज्जलुज्जलियदसणाभिरामो उउलच्छिसमत्तजायसोहे पइट्ठगंधुद्धयाभिरामो मेरुरिव नगवरो, विगुब्वियविचित्तवेसे, दीवसमुद्दाणं असंखपरिमाणनामधेज्जाणं मज्झकारेणं वीइवयमाणो, उज्जोयंतो पभाए विमलाए जीवलोगं बारावई पुरवरं च कण्हस्स य तस्स पासं उवयइ दिव्वरूबधारी / तए णं से देवे अंतलिक्खपडिवन्ने दसद्धवन्नाई सखिखिणियाई पवरवस्थाई परिहिए-(एक्को ताव एसो गमो, अण्णो वि गमो-) ताओ उक्किट्ठाए तुरियाए चवलाए चंडाए सीहाए उद्धृयाए 1. वर्ग 3 का सूत्र-५. 2. वर्ग 3 का सूत्र-१२ 3. इसी सूत्र में ऊपर आ गया है / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003476
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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