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________________ तृतीय वर्ग] श्रमण-निर्ग्रन्थ उच्च-नीच-मध्यम कुलों में यावत् भ्रमण करते हुए आहार-पानी प्राप्त नहीं करते। और मुनि जन भी जिन घरों से एक बार आहार ले आते हैं, उन्हीं घरों से दूसरी या तीसरी बार आहारार्थ नहीं जाते हैं। "देवानुप्रिये ! वास्तव में बात यह है कि हम भद्दिलपुर नगरी के नाग गाथापति के पुत्र और उनकी सुलसा भार्या के प्रात्मज छह सहोदर भाई हैं। पूर्णतः समान आकृति वाले यावत् नलकूबर के समान हम छहों भाइयों ने अरिहंत अरिष्टनेमि के पास धर्म-उपदेश सुनकर संसार-भय से उद्विग्न एवं जन्ममरण से भयभीत हो मुडित होकर यावत् श्रमणधर्म की दीक्षा ग्रहण की। तदनन्तर हमने जिस दिन दीक्षा ग्रहण की उसी दिन अरिहंत अरिष्टनेमि को वंदन-नमस्कार किया और वन्दन नमस्कार कर इस प्रकार का यह अभिग्रह करने की आज्ञा चाही-है भगवन् ! आपकी कर हम जीवन पर्यन्त बेले-बेले की तपस्या से अपनी प्रात्मा को भावित करते हुए विचरन चाहते हैं / " यावत् प्रभु ने कहा--- "देवानुप्रियो ! जिससे तुम्हें सुख हो वैसा करो, प्रमाद न करो।" उसके बाद अरिहंत अरिष्टनेमि की अनुज्ञा प्राप्त होने पर हम जीवन भर के लिये निरंतर बेले-बेले की तपस्या करते हुए विचरण करने लगे / तो इस प्रकार आज हम छहों भाई वेले की तपस्या के पारणा के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय कर, द्वितीय प्रहर में ध्यान कर, तृतीय प्रहर में अरिहंत अरिष्टनेमि की आज्ञा प्राप्त कर, तीन संघाटकों में उच्च-निम्न एवं मध्यम कुलों में भिक्षार्थ भ्रमण करते हुए तुम्हारे घर आ पहुंचे हैं। तो देवानुप्रिये ! ऐसी बात नहीं है कि पहले दो संघाटकों में जो मुनि तुम्हारे यहाँ आये थे वे हम ही हैं। वस्तुतः हम दूसरे हैं / " उन मुनियों ने देवकी देवी को इस प्रकार कहा और यह कहकर वे जिस दिशा से आये थे उसी दिशा की ओर चले गये। विवेचन–साधू-यूगल की तीसरी टोली का भी देवकी के घर में भिक्षार्थ गमन के समय आकृति और रूप के साम्य के कारण देवकी को मुनियुगल (जो पहले पाये थे) का तीसरी वार आना समझ लेने से शंका होती है, क्योंकि संयमशील मुनि विशिष्ट भिक्षा हेतू किसी गहस्थ के घर में पुनः पुनः नहीं पाते हैं / प्रस्तुत सूत्र में देवकी के मन में उठी शंका का मुनि-युगल ने समाधान प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत समाधान ने देवकी के मन में जो नयी उथल-पुथल मचाई, इसका वर्णन करते हुए सूत्रकार आगे कहते हैंपुत्रों की पहचान १०–तए णं तीसे देवईए देवीए अयमेयारूवे अज्झथिए चितिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पण्णे-एवं खलु अहं पोलासपुरे नयरे अइमुत्तेणं कुमारसमणेणं बालत्तणे वागरिमा-तुमण्णं देवाणुप्पिए ! अट्ठ पुत्ते पयाइस्ससि सरिसए जाव नलकुब्बरसमाणे, नो चेव णं भरहे वासे अण्णामो अम्मयानो तारिसए पुत्त पयाइस्संति / तं गं मिच्छा। इमं णं पच्चक्खमेव दिस्सइ-भरहे वासे अण्णाश्रो वि अम्मयानो खलु एरिसए जाव [सरिसए सरित्तए सरिव्वए नीलुप्पल-गवल-गुलिय-अयसिकुसुमप्पगासे, सिरिवच्छंकियवच्छे, कुसुम-कुडल-भद्दालए नलकुब्वरसमाणे] पुत्त पयायाो। तं गच्छामि गं अरहं अरिठ्ठोम बंदामि नमसामि, वंदित्ता नमंसित्ता इमं च णं एयारूवं वागरणं पुच्छिस्सामित्ति कट्ट एवं संपेहेइ, संपेहेत्ता कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ, सद्दावित्ता एवं वयासी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003476
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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