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________________ 134] [अन्तकृद्दशा का वर्णन औपपातिकसूत्र से समझ लेना चाहिए ! महाराजा विजय का पुत्र और श्रीदेवी का पात्मज अतिमुक्त नाम का कुमार था जो अतीव सुकुमार था। उस काल और उस समय श्रमण भगवान् महावीर क्रमशः विचरते हुए, एक गाम से दूसरे गाम को पावन करते हुए और शारीरिक खेद से रहित-संयम में आने वाली बाधा-पीडा से रहित विहार करते हुए पोलासपुर नगर के श्रीवन उद्यान में पधारे / उस काल, उस समय श्रमण भगवान महावीर के ज्येष्ठ शिष्य इन्द्रभूति, व्याख्याप्रज्ञप्ति में कहे अनुसार निरन्तर वेले-बेले का तप करते हुए संयम और तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरते थे। पारणे के दिन पहली पौरिसी में स्वाध्याय, दूसरी पौरिसी में ध्यान और तीसरी पौरिसी में शारीरिक शीघ्रता से रहित, मानसिक चपलता रहित, आकुलता और उत्सुकता रहित, होकर मुखवस्त्रिका की पडिलेखना करते हैं और फिर पात्रों और वस्त्रों की प्रतिलेखना करते हैं। फिर पात्रों की प्रमार्जना करके और पात्रों को लेकर जहाँ श्रमण भगवान महावीर विराजमान थे वहाँ पाए, पाकर भगवान् को वंदना-नमस्कार कर इस प्रकार निवेदन किया-- "हे भगवन् ! आज षष्ठभक्त के पारणे के दिन आपकी आज्ञा होने पर पोलासपुर नगर में ऊंच, नीच, और मध्यम कुलों में भिक्षा की विधि के अनुसार भिक्षा लेने के लिये जाना चाहता है। श्रमण भगवान् महावीर ने कहा देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हें सुख हो, करो, उसमें विलम्ब न करो। भगवान् की आज्ञा होने पर गौतमस्वामी भगवान् के पास से, गुणशीलक चैत्य से निकले / निकल कर शारीरिक त्वरा और मानसिक चपलता से रहित एवं प्राकुलता व उत्सुकता से रहित युग (धूसरा) प्रमाण भूमि को देखते हुए ईसिमितिपूर्वक पोलासपुर नगर में आये / वहाँ ऊंच, नीच, और मध्यम कुलों में भिक्षा की विधि अनुसार भिक्षा हेतु] भ्रमण करने लगे। इधर अतिमुक्त कुमार स्नान करके यावत् शरीर की विभूषा करके बहुत से लड़के-लड़कियों, बालक-बालिकाओं और कुमार-कुमारियों के साथ अपने घर से निकले और निकल कर जहाँ इन्द्रस्थान अर्थात् क्रीडास्थल था वहाँ पाये / वहाँ आकर उन बालक बालिकाओं के साथ खेलने लगे। उस समय भगवान गौतम पोलासपुर नगर में सम्पन्न-असम्पन्न तथा मध्य कुलों में यावत् भ्रमण करते हुए उस क्रीडास्थल के पास से जा रहे थे। विवेचन प्रस्तुत सूत्र पोलासपुर के राजकुमार अतिमुक्त कुमार तथा श्रमण भगवान् महावीर के प्रथम गणधर गौतम के मधुर-मिलन या प्रथम मुलाकात का वर्णन प्रस्तुत करता है। इसमें अतिमुक्त जिनके साथ खेलते हैं, उनके लिये "दारएहि य, डिभएहि य, कुमारएहि य" शब्द का प्रयोग हुअा है। दारक, डिभक तथा कुमार ये तीनों शब्द समानार्थी प्रतीत होते हैं परन्तु वृत्तिकार ने इनके विभिन्न अर्थ इस प्रकार बताये हैं—दारक-सामान्य बालक, अच्छी आयु वाला, डिभक छोटी आयुवाला, कुमार-अविवाहित / खेलने वाले स्थान को “इंदट्ठाणे" कहा है जिसका अर्थ होता है क्रोडास्थान, जहाँ पर इन्द्रस्तम्भनामक एक मोटा खंभा गाड़कर वालक और बालिकाएं खेलते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003476
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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