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षष्ठाध्ययन : प्रत्याख्यान ]
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से आत्मा उन्नत हो सके। इसलिये शास्त्रकारों ने बतलाया है कि भोजन में सात्विकता रखनी चाहिये । विकारजनक भोजन शरीर को दूषित किए बिना नहीं रह सकता ।
निर्विकृति के नौ आगार हैं। आठ आगारों का वर्णन तो पहले के पाठों में यथास्थान आ चुका है। 'प्रतीत्यम्रक्षित' नामक आगार नया है। भोजन बनाते समय जिन रोटी आदि पर सिर्फ उंगली से घी आदि चुपड़ा गया हो ऐसी वस्तुओं को ग्रहण करना, प्रतीत्यम्रक्षित आगार कहलाता है। इस आगार का यह भाव है कि घृत आदि विकृति का त्याग करने वाला साधक धारा के रूप में घृत आदि नहीं खा सकता है। घी से अत्यल्प रूप में चुपड़ी हुई रोटियाँ खा सकता है।
'प्रतीत्य सर्वथा रूक्षमण्डकादि, ईषत्सौकुमार्य प्रतिपादनाय यदंगुल्या ईषद् घृतं गृहीत्वा प्रक्षितं तदा कल्पते, न तु धारया । ' देवेन्द्र प्रतिक्रमणवृत्ति, तिलकाचार्य
११. प्रत्याख्यानपारणासूत्र
उग्गए सूरे नमुक्कारसहियं पच्चक्खाणं कयं । तं पच्चक्खाणं सम्मं कारणं फासियं, पालियं, तीरियं, किट्टियं, सोहियं, आराहियं । जं च न आराहियं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
भावार्थ - सूर्योदय होने पर जो नमस्कार सहित या "प्रत्याख्यान किया था, वह प्रत्याख्यान (मन,वचन) शरीर के द्वारा सम्यक् रूप से स्पृष्ट, पालित, शोधित, तीर्ण, कीर्तित एवं आराधित किया और जो सम्यक् रूप से आराधित न किया हो, उसका दुष्कृत मेरे लिये मिथ्या हो ।
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विवेचन यह प्रत्याख्यानपूर्ति का सूत्र है । कोई भी प्रत्याख्यान किया हो, उसकी समाप्ति प्रस्तुत
सूत्र के द्वारा करनी चाहिये। ऊपर मूल पाठ में 'नमुक्कारसहियं' नमस्कारिका का सूचक सामान्य शब्द है। इसके स्थान में जो प्रत्याख्यान ग्रहण कर रखा हो, उसका नाम लेना चाहिये। जैसे कि पौरुषी ली हो तो 'पौरुसीपच्चक्खाणं कयं' ऐसा कहना चाहिये ।
प्रत्याख्यान पालने के छह अंग हैं
सतत रक्षा करना ।
(१) फासियं (स्पृष्ट अथवा स्पर्शित ) गुरुदेव से या स्वयं विधिपूर्वक प्रत्याख्यान लेना । प्रत्याख्यान को बार-बार उपयोग में लाकर सावधानी
(२) पालियं (पालित)
साथ उसकी
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(३) सोहियं (शोधित) - कोई दूषण लग जाय तो सहसा उसकी शुद्धि करना। अथवा 'सोहिय' का संस्कृत रूप शोभित भी होता है । इस दशा में अर्थ होगा
गुरुजनों को, साथियों को अथवा अतिथिजनों को भोजन देकर स्वयं भोजन करना ।
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