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(४) तीरियं ( तीरित)
भोजन करना ।
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[ आवश्यकसूत्र
लिये हुये प्रत्याख्यान का समय पूरा हो जाने पर भी कुछ समय ठहरकर
(५) किट्टियं (कीर्तित) भोजन प्रारम्भ करने से पहले लिए हुये प्रत्याख्यान को विचार कर उत्कीर्तन-पूर्वक कहना कि मैंने अमुक प्रत्याख्यान अमुक रूप से ग्रहण किया था, वह भली-भांति पूर्ण हो गया है ।
(६) आराहियं (आराधित) १
अनुसार प्रत्याख्यान की आराधना करना ।
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सब दोषों से सर्वथा दूर रहते हुये ऊपर कही हुई विधि के
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१. आचार्य जिनदास ने 'आराधित' के स्थान पर 'अनुपालित' कहा है। अनुपालित का अर्थ किया है - तीर्थंकरदेव के वचनों का बार-बार स्मरण करते हुए प्रत्याख्यान का पालन करना - 'अनुपालियं नाम अनुस्मृत्य अनुस्मृत्य तीर्थंकरवचनं प्रत्याख्यानं पालियत्वं ।'
आवश्यकचूर्णि