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________________ १३४] [ आवश्यकसूत्र भावार्थ - मैं अभिग्रह का व्रत ग्रहण करता हूँ, अतएव अशन, पान, खादिम और स्वादिम चारों ही प्रकार के आहार का (संकल्पित समय तक) त्याग करता हूँ। अनाभोग, सहसाकार, महत्तराकार और सर्वसमाधिप्रत्ययाकार, उक्त चार आगारों के सिवाय अभिग्रहपूर्ति तक चारों प्रकार के आहार का त्याग करता हूँ। विवेचन – उपवास आदि के बाद अथवा बिना उपवास आदि के भी अपने मन में निश्चित प्रतिज्ञा कर लेना कि अमुक बातों के मिलने पर ही पारणा अर्थात् आहार ग्रहण करूंगा, अन्यथा व्रत, बेला आदि संकल्पित दिनों की अवधि तक आहार ग्रहण नहीं करूंगा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा को ' अभिग्रह' कहते हैं । अभिग्रह में जो बातें धारण करना हों, उन्हें मन में निश्चय कर लेने के बाद ही उपर्युक्त पाठ के द्वारा प्रत्याख्यान करना चाहिये। अभिग्रह की प्रतिज्ञा कठिन होती है। धीर एवं वीर साधक ही अभिग्रह का पालन कर सकते हैं । जैन इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि एक साधु ने सिंह-केसरिया मोदकों का अभिग्रह कर लिया था और वह अभिग्रह जब पूरा न हुआ तो पागल होकर रात दिन का विचार न रखकर पात्र लिये घूमने लगा। कल्पसूत्र की टीकाओं में उक्त उदाहरण आता है, अतः अभिग्रह करते समय अपनी शक्ति का विचार अवश्य कर लेना चाहिये। १०. निर्विकृतिकसूत्र निविगइयं पच्चक्खामि अन्नत्थऽणाभोगेणं, सहसागारेणं, लेवालेवेणं, गिहत्थसंसिढेणं, उक्खित्तविवेगेणं, पडुच्चमक्खिएणं, महत्तरागारेणं, सव्वसमाहिवत्तियागारेणं वोसिरामि। भावार्थ - मैं विकृतियों का प्रत्याख्यान करता हूँ। अनाभोग, सहसाकार, लेपालेप, गृहस्थसंसृष्ट, उत्क्षिप्तविवेक, प्रतीत्यम्रक्षित, पारिष्ठापनिक, महत्तराकार, सर्वसमाधिप्रत्ययाकार – उक्त नौ आगारों के सिवाय विकृति का परित्याग करता हूँ। विवेचन – मन में विकार उत्पन्न करने वाले भोज्य पदार्थों को विकृति कहते हैं - 'मनसो विकृतिहेतुत्वाद् विकृतयः' आचार्य हेमचन्द्र-कृत योगशास्त्रवृत्ति (तृतीय प्रकाश) । विकृति में दूध, दही, मक्खन, घी, तेल, गुड़, मधु आदि भोज्य पदार्थ सम्मिलित हैं। भोजन का वास्तविक उद्देश्य है शरीर और साथ ही मन को सबल बनाना। मन की सबलता से तात्पर्य है उसे शुद्ध अर्थात् दोषरहित रखना। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। किन्तु इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि मन के स्वस्थ न रहने पर भी काफी सीमा तक, जिसे हम केवल शारीरिक स्वस्थता कहते हैं, वह बनी रहती है। पर उससे आत्मा को कोई लाभ नहीं होता बल्कि हानि ही होती है। अतः आवश्यक है कि शरीर को ऐसी शुद्ध खुराक दी जाये जिससे शरीर भी स्वस्थ रहे और मन भी तथा इन दोनों की शुद्धता
SR No.003464
Book TitleAgam 28 Mool 01 Avashyak Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shobhachad Bharilla, Mahasati Suprabha
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1985
Total Pages204
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Agam, Canon, Ritual, & agam_aavashyak
File Size4 MB
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