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________________ ११८] [ आवश्यकसूत्र वा, देवे वा, नागे वा, जक्खे वा, भूए वा, एत्तिएहिं आगारेहि अण्णत्थ ) जावजीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं आठवां अणट्ठादण्डविरमणव्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोउं – कंदप्पे कुक्कुइए मोहरिए संजुत्ताहिगरणे उवभोगपरिभोगाइरित्ते तस्स मिच्छा मि दुक्कडं। भावार्थ - बिना प्रयोजन दोषजनक हिंसाकारी कार्य करना अनर्थदंड है । इसके चार भेद हैं - अपध्यान, प्रमादचर्या, हिंसादान और पापोपदेश । इष्ट संयोग व अनिष्ट वियोग की चिंता करना, दूसरों को हानि पहुंचाने का विचार करना अर्थात् मन में किसी भी प्रकार का दुर्ध्यान करना अपध्यान है । असावधानी से काम करना, धार्मिक कार्यों को त्याग कर दूसरे कार्यों में लगे रहना प्रमादचर्या है । दूसरों को हल, ऊखलमूसल, तलवार-बन्दूक आदि बिना प्रयोजन हिंसा के उपकरण देना हिंसादान है। पाप कार्यों का दूसरों को उपदेश देना पापोपदेश है। मैं इन चारों प्रकार के अनर्थदंड का त्याग करता हूँ। (यदि आत्मरक्षा के लिये, राजा की आज्ञा से, जाति के तथा परिवार के, कुटुम्ब के मनुष्यों के लिये, यक्ष, भूत आदि देवों के वशीभूत हो कर अनर्थदंड का सेवन करना पड़े तो इनका आगार, अपवाद-छूट, रखता हूँ। इन आगारों के सिवाय) मैं जन्मपर्यंत अनर्थदंड का मन, वचन, काया से स्वयं सेवन नहीं करूंगा और न कराउंगा। यदि मैंने काम जाग्रत करने वाली कथाएं की हों, भांडों की तरह दूसरों को हंसाने के लिये हंसी-दिल्लगी की हो या दूसरों की नकल की हो, निरर्थक बकवाद किया हो, तलवार, ऊखल, मूसल आदि हिंसाकारी हथियारों या औजारों का निष्प्रयोजन संग्रह किया हो, मकान बनाने आदि आरंभ-हिंसा का उपदेश दिया हो, अपनी तथा कुटुम्बियों की आवश्यकताओं के सिवाय अन्न, वस्त्र आदि का संग्रह किया हो तो मैं उसकी आलोचना करता हूँ और मैं चाहता हूँ कि मेरे सब पाप निष्फल हों। ९. सामायिकव्रत के अतिचार नववां सामायिकव्रत - सावज जोगं पच्चक्खामि जावनियमं पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि मणसा, वयसा, कायसा, ऐसी उद्दहणा प्ररूपणा तो है, सामायिक का अवसर आए सामायिक करूं तब फरसना करके शुद्ध होऊ एवं नवमे सामायिकव्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तं जहा ते आलोउं -मणदुप्पणिहाणे, वयदुप्पणिहार्ण, कायदुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सइ अकरणया, सामाइयस्स अणवट्ठियस्स करणया तस्स मिच्छा मि दुक्कडं। भावार्थ - मैं मन, वचन, काया की दुष्ट प्रवृत्ति को त्याग कर जितने काल का नियम किया है, उसके अनुसार सामायिकव्रत का पालन करूंगा मन में बुरे विचार उत्पन्न नहीं होने से, कठोर या पापजनक वचन नहीं बोलने से, काया की हलन-चलन आदि क्रिया को रोकने से आत्मा में जो शांतिसमाधि डत्पन्न
SR No.003464
Book TitleAgam 28 Mool 01 Avashyak Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shobhachad Bharilla, Mahasati Suprabha
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1985
Total Pages204
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Agam, Canon, Ritual, & agam_aavashyak
File Size4 MB
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