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[ आवश्यकसूत्र
दोहा अनन्त चौबीसी जिन नमू, सिद्ध अनन्ते कोड़। केवलज्ञानी गणधरा, बन्दू बे कर जोड़॥ १॥ दोय कोडि केवलधरा, विहरमान जिन बीस। सहस्र युगल कोडि नमू, साधु नमूं निशदीश ॥ २॥ धन साधु, धन साध्वी, धन-धन है जिन धर्म । ये समऱ्या पातक झरे, टूटे आठों कर्म ॥ ३ ॥ अरिहंत सिद्ध समरूं सदा, आचारज उपाध्याय। साधु सकल के चरण को, वन्दूं शीश नवाय ॥ ४॥ शासननायक सुमरिये, भगवन्त वीर जिणंद। अलिय विघन दूरे हरे, आपे परमानन्द ॥ ५॥ अंगुष्ठे अमृत बसे, लब्धि तणा भण्डार । श्री गुरु गौतम सुमरिये, वांछित फल दातार ॥ ६ ॥ गुरु गोविन्द दोनों खड़े, किसके लागूं पाय। बलिहारी गुरुदेव की, गोविन्द दियो बताय ॥७॥ लोभी गुरु तारे नहीं, तिरे सो तारणहार। जो तूं तिरियो चाह तो, निर्लोभी गुरु धार ॥ ८ ॥ साधु सती ने शूरमा, ज्ञानी ने गजदन्त। इतना पीछा ना हटे, जो जुग जाय पड़न्त ॥ ९ ॥ गुरु दीपक गुरु चांदणी, गुरु बिन घोर अंधार। पलक न विसरूं तुम भणी, गुरु मुझ प्राण आधार ॥१०॥
क्षामणासूत्र -
आयरिय-उवज्झाए, सीसे साहम्मिए कुल-गणे य। जे मे केई कसाया, सव्वे तिविहेण खामेमि॥१॥ सव्वस्स समणसंघस्स, भगवओ अंजलि करिअ सीसे। सव्वं खमावइत्ता, खमामि सव्वस्स अहयंपि॥२॥ सव्वस्स जीवरासिस्स, भावओ धम्मनिहियनियचित्तो। सर्व खमावइत्ता, खमामि सव्वस्स अहयंपि॥३॥