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________________ अठारहवाँ उद्देशक ] [ ३९५ १०. जो भिक्षु प्रतिनावा करके नावा में बैठता है या बैठने वाले का अनुमोदन करता है । ११. जो भिक्षु ऊर्ध्वग । मिनी नावा पर या अधोगामिनी नावा पर बैठता है या बैठने वाले का अनुमोदन करता है । १२. जो भिक्षु एक योजन से अधिक प्रवाह में जाने वाली अथवा अर्धयोजन से अधिक प्रवाह में जाने वाली नावा पर बैठता है या बैठने वाले का अनुमोदन करता है । १३. जो भिक्षु नावा को उपर की ओर ( किनारे) खींचता है, नीचे की ओर ( जल में ) खींचता है, लंगर डाल कर बांधता है या रस्सी से कस कर बांधता है या ऐसा करने वाले का अनुमोदन करता है । १४. जो भिक्षु नावा को नौ-दंड ( चप्पू) से, नौका पप्फिडक ( नौका चलाने के उपकरण - विशेष ) से, बांस से या बल्ले से चलाता है या चलाने वाले का अनुमोदन करता है । १५. जो भिक्षु नाव में से भाजन द्वारा, पात्र द्वारा, मिट्टी के बर्तन द्वारा या नावा उसिंचनक द्वारा पानी निकालता है या निकालने वाले का अनुमोदन करता है । १६. जो भिक्षु नाव के छिद्र में से पानी आने पर अथवा नाव को डुबती हुई देखकर हाथ से, पैर से, पीपल के पत्ते ( पत्र समूह ) से, कुस के पत्ते ( कुससमूह ) से, मिट्टी से या वस्त्रखंड से उसके छेद को बन्द करता है या बंद करने वाले का अनुमोदन करता है । १७. नाव में रहा हुआ भिक्षु नाव में रहे हुए गृहस्थ से प्रशन, पान, खादिम या स्वादिम ग्रहण करता है या ग्रहण करने वाले का अनुमोदन करता है । १८. नाव में रहा हुआ भिक्षु जल में रहे हुए गृहस्थ से अशन, पान, खादिम या स्वादिम ग्रहण करता है या ग्रहण करने वाले का अनुमोदन करता है । १९. नाव में रहा हुआ भिक्षु कीचड़ में रहे हुए गृहस्थ से प्रशन, पान, खादिम या स्वादिम ग्रहण करता है या ग्रहण करने वाले का अनुमोदन करता है । २०. नाव में रहा हुआ भिक्षु भूमि पर रहे हुए गृहस्थ से प्रशन, पान, खादिम या स्वादिम ग्रहण करता है या ग्रहण करने वाले का अनुमोदन करता है । २१. जल में रहा हुआ भिक्षु नाव में रहे हुए गृहस्थ से प्रशन, पान, खादिम या स्वादिम ग्रहण करता है या ग्रहण करने वाले का अनुमोदन करता है । २२. जल में रहा हुआ भिक्षु जल में रहे हुए गृहस्थ से प्रशन, पान, खादिम या स्वादिम ग्रहण करता है या ग्रहण करने वाले का अनुमोदन करता है । २३. जल में रहा हुआ भिक्षु कीचड़ में रहे हुए गृहस्थ से प्रशन, पान, खादिम या स्वादिम ग्रहण करता है या ग्रहण करने वाले का अनुमोदन करता है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003462
Book TitleAgam 24 Chhed 01 Nishith Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages567
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_nishith
File Size11 MB
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