SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 448
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३४८] [निशीथसूत्र अागम में गणपरिवर्तन का प्रमुख कारण यह कहा है कि गणपरिवर्तन से वास्तव में प्रात्मशान्ति होती हो और आत्मगुणों की वृद्धि होती हो तो जाना कल्पता है किन्तु गणपरिवर्तन करके भी आत्मा में अशान्ति या आत्मगुणों की हानि होती हो तो गुरु की आज्ञा मिलने पर भी गणपरिवर्तन करने में जिनाज्ञा नहीं है, ऐसा इन सूत्रों से समझना चाहिये । ___ भावार्थ यह है कि यदि कोई अपने गण के प्राचार से अपेक्षाकृत कम प्राचार वाले गण में जाना चाहे तो उसे सूत्रानुसार जाना नहीं कल्पता है। फिर भी कोई भिक्षु सहनशीलता की कमी से या शारीरिक-मानसिक समाधि न रहने से ऐसे गण में जावे तो प्रस्तुत सूत्र के अनुसार उसे लघुचौमासी प्रायश्चित्त आता है। ठाणांग सूत्र के ५वें ठाणे में जो गण-संक्रमण के कारण कहे हैं, उनमें से किसी भी कारण से यदि कोई भिक्षु आचार्यादि की आज्ञा लेकर गण-संक्रमण करे तो सूत्रोक्त प्रायश्चित्त नहीं पाता है। गणसंक्रमण के पूर्व भविष्य के हिताहित का पूर्ण विचार करना अत्यावश्यक है, क्योंकि बारंबार गणसंक्रमण करने वाले को उत्तरा अ. १७ में पापश्रमण कहा गया है तथा छः मास के अन्दर ही फिर अन्य गण में संक्रमण करे तो उसे दशा. द. २ में सबलदोष कहा है। अतः आवेश में आकर बिना विचार किए गणसंक्रमण नहीं करना चाहिये। कदाग्रही के साथ लेन-देन करने का प्रायश्चित्त १६. जे भिक्खू बुग्गहवक्ताणं असणं वा, पाणं वा, खाइमं वा, साइमं वा देइ, दतं वा साइज्जइ। १७. जे भिक्खू बुग्गहवक्कंताणं असणं वा, पाणं वा, खाइमं वा, साइमं वा पडिच्छइ, पडिच्छंतं वा साइज्जइ। १८. जे भिक्खू बुग्गहवक्कंताणं वत्थं वा, पडिग्गहं वा, कंबलं वा, पायपुछणं वा देइ, देतं वा साइज्जइ। १९. जे भिक्खू बुग्गहवक्ताणं वत्थं वा, पडिग्गहं वा, कंबलं वा, पायपुछणं वा पडिच्छइ, पडिच्छंतं वा साइज्जइ। २०. जे भिक्खू बुग्गहवक्कंताणं वसहिं देइ, देंतं वा साइज्जइ। २१. जे भिक्खू बुग्गहवक्कंताणं वसहि पडिच्छइ, पडिच्छंतं वा साइज्जइ । २२. जे भिक्खू वुग्गहवक्कंताणं वसहि अणुपविसइ, अणुपविसंतं वा साइज्जइ । २३. जे भिक्खू बुग्गहवक्कंताणं सज्झायं देइ, देतं वा साइज्जइ। २४. जे भिक्खू बुग्गहवक्कंताणं सज्झायं पडिच्छइ, पडिच्छंतं वा साइज्जइ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003462
Book TitleAgam 24 Chhed 01 Nishith Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages567
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_nishith
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy