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________________ प्रथम उद्देशक] [७ इस महाव्रत का महत्त्व इतना है कि इसके पूर्ण पालक के सामने देव, दानव, मानव आदि सभी नतमस्तक रहते हैं । ___ इसके माहात्म्य का और इसकी साधना के साधक बाधक कारणों का आगमों में विस्तृत वर्णन है। __ इसके पालक साधु-साध्वियां वेदमोहनीय के आकस्मिक प्रबल उदय से होने वाले अतिक्रमादि के आचरणों से सतत सजग रहकर इस महाव्रत की सुरक्षा करते रहें, इसी भावना से इस आगम में यह प्रथम प्रायश्चित्त सूत्र प्रस्तुत किया गया है। जे भिक्खू–बृहत्कल्प सूत्र उद्देशक ३-४-५ के किसी-किसी सूत्र में केवल "भिक्षु या श्रमण निर्ग्रथ” इस तरह पुरुष प्रधान शब्द का प्रयोग हुआ है । तथापि ये विधान भिक्षु, भिक्षुणी दोनों के लिये उपयुक्त हैं । आचारांगसूत्र में भिक्षु, भिक्षुणी तथा बृहत्कल्पसूत्र में निग्रंथ, निर्ग्रन्थी दोनों पदों का प्रयोग है, रचनापद्धति के अनेक प्रकार हो सकते हैं, फिर भी जहाँ जो अर्थ संगत होता है, वह समझा जाता है। निशीथसूत्र में सत्रहवें उद्देशक के कुछ सूत्रों को छोड़कर प्रायः सर्वत्र “भिक्षु" शब्द के प्रयोग से ही प्रायश्चित्त कथन हुआ है, फिर भी उपलक्षण से साध्वी के लिए यथायोग्य प्रायश्चित्त-विधान समझ लेने चाहिए। हत्थकम्म-वेद-मोहोदय से प्रादुर्भूत विभावदशाजन्य विकृत विचारों से हस्तकर्म का संकल्प क्रियान्वित होता है । इसके दुष्परिणामों का विस्तृत वर्णन एवं इससे मुक्ति पाने के उपायों को जानने के लिये भाष्य एवं चूणि का विवेकपूर्वक स्वाध्याय करना चाहिये । करेइ, करेंतं वा साइज्जइ-सूत्र में कराने की क्रिया नहीं दी गई है। “कराना" भी एक प्रकार का अनुमोदन ही है, क्योंकि कराने में अनुमोदन निश्चित है जिससे कराने की क्रिया का भी ग्रहण हो जाता है । चूर्णिकार ने भी-- "साइज्जणा दुविहा-कारावणे, अनुमोदने" इस प्रकार व्याख्या की है तथा आदि और अंत के कथन से मध्य का ग्रहण भी हो सकता है। अतः जहाँ पर भी "करेइ, करेंतं वा साइज्जइ पाठ है, वहाँ यह अर्थ समझ लेना चाहिये कि "करता है या करवाता है या करने वाले का अनुमोदन करता है।" किन्तु जहाँ पर "कारेइ कारेंतं वा साइज्जई" पाठ हो वहाँ “अन्य से करवाता है या करवाने वाले का अनुमोदन करता है," इस प्रकार अर्थ समझना चाहिये। वर्तमान में उपलब्ध निशीथसूत्र की प्रतियों में प्रत्येक सूत्र के साथ प्रायश्चित्त सूचक पाठ नहीं है, किन्तु प्राचीन काल में प्रत्येक सूत्र के साथ प्रायश्चित्त पाठ रहा होगा। चूर्णिकार प्रायः अनेक सूत्रों के शब्दार्थ और विवेचन में प्रायश्चित्त का कथन करते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003462
Book TitleAgam 24 Chhed 01 Nishith Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages567
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_nishith
File Size11 MB
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