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________________ ५३४] [प्रज्ञापनासूत्र की (अदत्तादानक्रिया का कथन करना चाहिए।) १५७८.[१] अस्थि णं भंते ! जीवाणं मेहुणेणं किरिया कजति ? हंता ! अस्थि । कम्हि णं भंते ! जीवाणं मेहुणेणं किरिया कजति ? गोयमा ! रूवेसु वा रूवसहगतेसु वा दव्वेसु । [१५७८-१ प्र.] भगवन् ! क्या जीवों को मैथुन (के अध्यवसाय) से (मैथुन-) क्रिया लगती है? [उ.] हाँ, ! (गौतम !) (मैथुनक्रिया संलग्न) होती है । [प्र.] भगवन् ! किस (विषय) में जीवों के मैथुन (के अध्यवसाय) से (मैथुन-) क्रिया लगती है ? [उ.] गौतम ! रूपों अथवा रूपसहगत (स्त्री आदि) द्रव्यों (के विषय) में (यह क्रिया लगती है ।) [२] एवं णेरइयाणं णिरंतरं जाव वेमाणियाणं । [१५७८-२] इसी प्रकार (समुच्चय जीवों के मैथुनक्रियाविषयक आलापकों के समान नैरयिकों से लेकर निरन्तर (लगातार) वैमानिकों तक (मैथुनक्रिया के आलापक कहने चाहिए।) १५७९.[१] अत्थि णं भंते ! जीवाणं परिग्गहेणं किरिया कजइ ? हंता ! अस्थि । कम्हि णं भंते ! जीवाणं परिग्गहेणं किरिया कजति ? गोयमा ! सव्वदव्वेसु। [१५७९-१ प्र.] भगवन् ! क्या जीवों के परिग्रह (के अध्यवसाय) से (परिग्रह-) क्रिया लगती है ? [उ.] हाँ, गौतम ! (परिग्रहक्रिया लगती) है। [प्र.] भगवन् ! किस (विषय) में जीवों के परिग्रह (के अध्यवसाय) से (परिग्रह-) क्रिया लगती है? [उ.] गौतम ! समस्त द्रव्यों (के विषय) में (यह क्रिया लगती है।) [२] एवं णेरइयाणं जाव वेमाणियाणं । [१४७९-२] इसी तरह (समुच्चय जीवों के परिग्रह-क्रियाविषयक आलापकों के समान) नैरयिकों से लेकर वैमानिकों तक (परिग्रह-क्रिया-विषयक आलापक कहने चाहिए।) १५८०. एवं कोहेणं माणेणं मायाए लोभेणं पेजेणं दोसेणं कलहेणं अब्भक्खाणेणं पेसुण्णेणं परपरिवाएणं अरतिरतीए मायामोसेणं मिच्छादसणसल्लेणं सव्वेसु जीव-णेरइयभेदेसु भाणियव्वं
SR No.003457
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 02 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1984
Total Pages545
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_pragyapana
File Size11 MB
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