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________________ १८० ] की वक्तव्यता के समान (जानना चाहिए।) ९९८. वेमाणिया णं भंते ! ते णिज्जरापोग्गले किं जाणंति पासंति आहारेंति ? गोयमा ! जहा मणूसा (सु. ९९६ ) । णवरं वेमाणिया दुविहा' पण्णत्ता । तं जहा माइमिच्छद्दिट्ठिउववण्णगा य अमाइसम्मद्दिट्टिउववण्णगा य । तत्थ णं जे ते माइमिच्छद्दिट्ठिउववन्नगा ते णं न याणंति न पासंति आहारिति । तत्थ णं जे ते अमाइसम्मद्दिट्ठिउववन्नगा ते दुविहा पन्नत्ता, तं जहाअणंतरोववन्नगा य परंपरोववन्नगा य । तत्थ णं जे ते अणंतरोववण्णगा ते णं ण याणंति ण पासंति आहारेंति । तत्थ णं जे ते परंपरोववण्णगा ते दुविहा पण्णत्ता, तं जहा - पज्जत्तगा य अपज्जत्तगा य । तत्थ णं जे ते अपज्जत्तगा ते 'ण याणंति ण पासंति आहारेंति । तत्थ णं जे ते पज्जत्तगा ते दुविहा तं जहा - उवउत्ता य अणुवउत्ता य । तत्थ णं जे ते अणुवउत्ता ते णं ण याणंति ण पासंति आहारेंति, तत्थ णं जे ते उवउत्ता ते णं जाणंति पासंति आहारेंति । से एणट्टेणं गोयमा ! एवं वुच्चतिअत्थेगइया ण जाणंति जाव अत्थेगइया. आहारेंति । पण्णत्ता, [ प्रज्ञापनासूत्र [९९८ प्र.] भगवन् ! क्या वैमानिक देव उन निर्जरापुद्गलों को जानते हैं, देखते हैं, आहार अर्थात् ग्रहण करते हैं ? [९९८ उ.] गौतम ! जैसे मनुष्यों से सम्बन्धित वक्तव्यता (सू. ९९६ में) कही है, उसी प्रकार वैमानिक की वक्तव्यता समझनी चाहिए। विशेष यह है कि वैमानिक दो प्रकार के कहे गए हैं, वे इस प्रकार - मायीमिथ्यादृष्टि-उपपन्नक और अमायी- सम्यग्दृष्टि- -उपपन्नक। उनमें से जो मायी - मिथ्यादृष्टि - उपपन्नक होते हैं, वे (उन्हें) नहीं जानते, नहीं देखते, (किन्तु) आहार करते हैं। उनमें से जो अमायी- सम्यग्दृष्टि - उपपन्नक हैं, वे दो प्रकार के कहे गए हैं, वे इस प्रकार अनन्त - रोपपन्नक और परम्परोपपन्नक । उनमें से जो अनन्तरोपपन्नक (अनन्तर - उत्पन्न) हैं, वे नहीं जानते, नहीं देखते, आहार करते हैं। उनमें से जो परम्परोपपन्नक हैं, वे दो प्रकार के कहे हैं, यथा - पर्याप्तक और अपर्याप्तक। उनमें से जो अपर्याप्तक हैं, वे नहीं जानते, नहीं देखते, आहार करते हैं। उनमें जो पर्याप्तक हैं, वे दो प्रकार के कहे गए हैं - उपयोगयुक्त और उपयोगरहित । जो उपयोगरहित हैं, वे नहीं जानते, नहीं देखते, (किन्तु) आहार करते हैं । उनमें से जो उपयोगयुक्त हैं, वे जानते हैं, देखते हैं और आहार करते हैं। इस हेतु से हे गौतम ! ऐसा कहा जाता है कि कोई-कोई नहीं जानते हैं यावत् कोई-कोई आहार करते हैं । - विवेचन - ग्यारहवाँ आहारद्वार- प्रस्तुत चार सूत्रों (सू. ९९५ से ९९८ तक) में चौवीस दण्डकों में निर्जरापुद्गलों के जानने, देखने और आहार करने से सम्बन्धित प्ररूपणा की गई हैं। प्रश्न और उत्तर का आशय प्रस्तुत प्रश्न का आशय यह है कि पुद्गलों का स्वभाव नाना रूपों में परिणत होने का है, अतएव योग्य सामग्री मिलने पर निर्जरापुद्गल आहार के रूप में भी परिणत हो सकते हैं। जब वे आहाररूप में परिणत होते हैं तब नैरयिक उक्त निर्जरापुद्गलों को जानते-देखते हुए आहार (लोमाहार) -
SR No.003457
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 02 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1984
Total Pages545
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_pragyapana
File Size11 MB
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