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________________ पन्द्रहवाँ इन्द्रियपद : प्रथम उद्देशक ] [१७५ पोग्गले पुढे पविट्ठाई सद्दाइं सुणेति । [९९२-१ प्र.] भगवन् ! श्रोत्रेन्द्रिय का विषय कितना कहा गया है ? [९९२-१ उ.] गौतम ! (श्रोत्रेन्द्रिय) जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग (दूर शब्दों को) एवं उत्कृष्ट बारह योजनों से (१२ योजन दूर से) आए अविच्छिन्न (विच्छिन्न, विनष्ट या बिखरे न हुए) शब्दवर्गणा के पुद्गल के स्पृष्ट होने पर (निर्वृत्तीन्द्रिय में) प्रविष्ट शब्दों को सुनती है । [२] चक्खिदियस्स णं भंते ! केवतिए विसए पण्णत्ते ? गोयमा ! जहण्णेणं अंगुलस्स संखेजतिभागाओ, उक्कोसेणं सातिरेगाओ जोयणसयसहस्साओ अच्छिण्णे पोग्गले अपुढे अपविट्ठाई रूवाइं पासति । [९९२-२ प्र.] भगवन् ! चक्षुरिन्द्रिय का विषय कितना कहा गया है ? [९९२-२ उ.] गौतम ! (चक्षुरिन्द्रिय) जघन्य अंगुल के संख्यातवें भाग (दूर स्थित रूपों को) एवं उत्कृष्ट एक लाख योजन से कुछ अधिक (दूर) के अविच्छिन्न (रूपवान) पुद्गलों के अस्पृष्ट एवं अप्रविष्ट रूपों को देखती है। [३] घाणिंदियस्स पुच्छा । गोयमा ! जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेजतिभागातो, उक्कोसेणं णवहिं जोयणेहितो अच्छिण्णे पोग्गले पुढे पविट्ठाइं गंधाइं अग्घाति [९९२-३ प्र.] भगवन् ! घ्राणेन्द्रिय का विषय कितना कहा गया है ? यह प्रश्न है। [९९२-३ उ.] गौतम ! (घ्राणेन्द्रिय) जघन्य अंगुल के असंख्यातवें भाग (दूर से आए गधों को) और उत्कृष्ट नौ योजनों से आए अविच्छिन्न (गन्ध-) पुद्गल के स्पृष्ट होने पर (निर्वृत्तीन्द्रिय में) प्रविष्ट गन्धों को सूंघ लेती है। [४] एवं जिब्भिंदियस्स वि फासिंदियस्स वि ।। [९९२-४] जैसे घ्राणेन्द्रिय के विषय (-परिमाण) का निरूपण किया है, वैसे ही जिह्वेन्द्रिय एवं स्पर्शनेन्द्रिय के विषय-परिणाम के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए । विवेचन - नौवाँ विषय (-परिमाण) द्वार - प्रस्तुत सूत्र (९९२) में क्रमशः बताया गया है कि कितनी दूर से पांचों इन्द्रियों में अपने-अपने विषय को ग्रहण करने की जघन्य और उत्कृष्ट क्षमता है ? इन्द्रियों की विषय-ग्रहणक्षमता - (१) श्रोत्रेन्द्रिय जघन्यतः आत्मांगुल के असंख्यातवें भाग दूर से आए हुए शब्दों को सुन सकती है और उत्कृष्ट १२ योजन दूर से आए हुए शब्दों को सुनती है, बशर्ते कि वे
SR No.003457
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 02 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1984
Total Pages545
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_pragyapana
File Size11 MB
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