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________________ ९८] [प्रज्ञापनासूत्र गोयमा ! इच्चेयाइं चत्तारि भासज्जायाइं आउत्तं भासमाणे आराहए, णो विराहए । तेण परं अस्संजयाऽविरयाऽपडिहयाऽपच्चक्खायपावकम्मे सच्चं वा भासं भासंतो मोसं वा सच्चामोसं वा असच्चामोसं वा भासं भासमाणे णो आराहए, विराहए । _ [८९९ प्र.] भगवन् ! इन चारों भाषा-प्रकारों को बोलता हुआ (जीव) आराधक होता है, अथवा विराधक? [८९९ उ.] गौतम ! इन चारों प्रकार की भाषाओं को उपयोगपूर्वक (आयुक्त होकर) बोलने वाला आराधक होता है, विराधक नहीं। उससे पर - (अर्थात् उपयोगपूर्वक बोलने वाले से भिन्न) जो असंयत, अविरत.पापकर्म का प्रतिघात और प्रत्याख्यान न करने वाला सत्यभाषा बोलता हआ तथा मषा आ तथा मृषाभाषा, सत्यामुषा और असत्यामृषा भाषा बोलता हुआ (व्यक्ति) आराधक नहीं है, विराधक है। ९००. एतेसि णं ते ! जीवाणं सच्चभासगाणं मोसभासगाणं सच्चामोसभासगाणं असच्चामोसभासगाणं अभासगाण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा ४ ? ' गोयमा ! सव्वत्थोवा जीवा सच्चभासगा, सच्चामोसभासगा असंखेजगुणा, मोसभासगा असंखेजगुणा, असच्चामोसभासगा असंखेजगुणा, अभासगा अणंतगुणा । ॥पण्णवणाए भगवईए एक्कारसमं भासापयं समत्तं॥ [९०० प्र.] भगवन् ! इन सत्यभाषक, मृषाभाषक, सत्यामृषाभाषक और असत्यामृषाभाषक तथा अभाषक जीवों में से कौन, किनसे अल्प, बहुत, तुल्य और विशेषाधिक हैं ? [९०० उ.] गौतम ! सबसे थोड़े जीव सत्यभाषक हैं, उनसे असंख्यातगुणे सत्यामृषाभाषक हैं, उनकी अपेक्षा मृषाभाषक असंख्यातगुणे हैं, उनसे असंख्यातगुणे असत्यामृषाभाषक जीव हैं और उनकी अपेक्षा अभाषक जीव अनन्तगुणे हैं । विवेचन - सोलह वचनों और चार भाषाजातों के आराधक-विराधक एवं अल्पबहुत्व की प्ररूपणा - प्रस्तुत पांच सूत्रों (सू. ८९६ से ९०० तक) में सोलह प्रकार के वचनों तथा सत्यादि चार प्रकार की भाषाओं का उल्लेख करके उनकी प्रज्ञापनिता (सत्यता) और उनके भाषकों की आराधकता-विराधकता की प्ररूपणा की गई है। अन्त में उक्त चारों प्रकार की भाषाओं के भाषकों के अल्पबहुत्व का निरूपण किया गया है। सोलह प्रकार के वचनों की व्याख्या - १. एकवचन - एकत्वप्रतिपादक भाषा, जैसे पुरुषः अर्थात्- एक पुरुष। २. द्विवचन - द्वित्वप्रतिपादक भाषा, जैसे-पुरुषौ, अर्थात्-दो पुरूष । ३. बहुवचन - बहुत्वप्रतिपादक कथन, जैसे - पुरुषाः अर्थात्-बहुत-से-पुरुष । ४. स्त्रीवचन - स्त्रीलिंगवाचक शब्द, जैसे
SR No.003457
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 02 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1984
Total Pages545
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_pragyapana
File Size11 MB
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