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परिशिष्ट - टिप्पण
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काकन्दी
जितशत्रु राजा की राजधानी और घोर तपस्वी धन्य अनगार की जन्मभूमि ।
यह उत्तर भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नगरी थी। भगवान् महावीर के समय में इस नगरी में जितशत्रु राजा
राज्य करता था।
काकन्दी नगरी के बाहर 'सहस्राम्रवन' नाम का एक सुन्दर उद्यान था । भगवान् का समवसरण यहीं पर लगा था। धन्य अनगार की दीक्षा भी इसी उद्यान में हुई थी।
वर्तमान में गोरखपुर से दक्षिण-पूर्व तीस मील पर नूनखार स्टेशन से दो मील पर कहीं काकन्दी रही होगी। सहस्संबवण
सहस्राम्रवन। आगमों में इस उद्यान का प्रचुर उल्लेख मिलता है। काकन्दी नगरी के बाहर भी इसी नाम का एक सुन्दर उद्यान था, जहाँ पर धन्यकुमार और सुनक्षत्रकुमार की दीक्षा हुई थी ।
सहस्राम्रवन का उल्लेख निम्नलिखित नगरों के बाहर भी आता है—
१. काकन्दी के बाहर ।
२. गिरनार पर्वत पर ।
३. काम्पिल्य नगर के बाहर ।
४. पाण्डु मथुरा के बाहर ।
मिथिला नगरी के बाहर ।
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६. हस्तिनापुर के बाहर आदि ।
जितशत्रु राजा
शत्रु को जीतने वाला। जिस प्रकार बौद्ध जातकों में प्राय: ब्रह्मदत्त राजा का नाम आता है, उसी प्रकार जैनग्रन्थों में प्रायः जितशत्रु राजा का नाम आता है। जितशत्रु के साथ प्रायः धारिणी का भी नाम आता है। किसी भी कथा के प्रारम्भ में किसी न किसी राजा का नाम बतलाना कथाकारों की पुरातन पद्धति रही है।
इस नाम का भले ही कोई राजा न भी हो, तथापि कथाकार अपनी कथा के प्रारम्भ में इस नाम का उपयोग करता है। वैसे जैन साहित्य के कथा-ग्रन्थों में जितशत्रु राजा का उल्लेख बहुत आता है। निम्नलिखित नगरों के राजा का नाम जितशत्रु बताया गया है
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नगर वाणिज्यग्राम चम्पानगरी
उज्जयनी
सर्वतोभद्र नगर
मिथिला नगरी
पांचाल देश
आमलकल्पा नगरी
राजा
जितशत्रु
जितशत्रु
जितशत्रु
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जितशत्रु
जितशत्रु
जितशत्रु
जितशत्रु