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________________ तृतीय वर्ग था। वे आत्मिक दीप्ति से देदीप्यमान थे । इस सूत्र में 'उभडघडमुहे त्ति' पद की व्याख्या वृत्तिकार ने इस प्रकार की है— 'उद्भटं - विकरालं, क्षीणप्रायदशानच्छदत्वाद् घटकस्येव मुखं यस्य स तथा।' इस कथन से मुख पर मुख- पत्ती बंधी हुई सिद्ध नहीं होती ? ऐसी शंका उपस्थित होती है। समाधान यह है कि यहाँ पर सूत्रकार का तात्पर्य केवल तप के कारण क्षीण शरीर के वर्णन से ही है, धर्मोपकरणों के वर्णन से नहीं । यदि वे शरीर सम्बन्धी अन्य धर्मोपकरणों का वर्णन करते और मुखवस्त्रिका का न करते तो यह शङ्का उपस्थित हो सकती थी । परन्तु यहाँ तो किसी भी उपकरण का वर्णन नहीं किया गया है। अतः स्पष्ट है कि यहाँ सूत्रकार को उनकी शरीर-निरपेक्ष तपश्चर्या का और उसके कारण शरीर के अंगोपांगों पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन करना ही अभिप्रेत है। यदि ऐसा न माना जाय तो उनके कटि आदि अङ्गों के वर्णन के साथ चोलपट्ट आदि का भी वर्णन अवश्य मिलता। अतएव मुख अथवा होठों की कृशता आदि के वर्णन से उनके मुख पर मुखवस्त्रिका का अभाव किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होता । भगवान् महावीर द्वारा प्रशंसा १६—तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे, गुणसिलए चेइए, सेणिए राया । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे समोसढे । परिसा निग्गया। सेणिए निग्गए। धम्मकहा। परिसा पडिगया । तए से से या समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्मं सोच्चा निसम्म समणं भगवं महावीरं वंदइ नमंसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी— ', इमासिं णं भंते! इंदभूइ-पामोक्खाणं चोद्दसण्हं समणसाहस्सीणं कयरे अणगारे महादुक्करकारए चेव महाणिज्जरयराए चेव ? एवं खलु सेणिया! इमासिं इंदभूइ - पामोक्खाणं चोद्दसण्हं समणसाहस्सीणं धण्णे अणगारे महादुक्करकारए चेव महाणिज्जरयराए चेव । सेकेणद्वेणं भंते! एवं वुच्चइ इमासिं जाव [ इमासिं इंदभूड़-पामोक्खाणं चोद्दसहं समणसाहस्सीणं ] धणे अणगारे महादुक्करकारए चेव महाणिज्जरयराए चेव ? एवं खलु सेणिया! तेणं कालेणं तेणं समएणं कायंदी नामं नयरी जाव [ धण्णे दारए ] उप्पिं पासायवडिंसए विहरइ । ३९ तणं अण्णा कयाई पुव्वाणुपुव्वीए चरमाणे गामाणुगामं दूइज्जमाणे जेणेव कायंदी नयरी जेणेव सहसंबवणे उज्जाणे तेणेव उवागए। उवागमित्ता अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिण्हामि संजमेणं जाव [ तवसा अप्पाणं भावेमाणे ] विहरामि । परिसा निग्गया, तहेवं जाव' पव्वइए जाव' बिलमिव जावर आहारेइ । धणस्स णं अणगारस्स पादाणं शरीरवण्णओ सव्वो जाव' उवसोभेमाणे - उवसोभेमाणे चिट्ठा | १. अणुत्तरोववाइयदसा वर्ग ३, सूत्र ४. २. अणुत्तरोववाइयदसा वर्ग ३, सूत्र ४-५-६. ३. अणुत्तरोववाइयदसा वर्ग ३, सूत्र ७. ४. अणुत्तरोववाइयदसा वर्ग ३, सूत्र ७ से १५ तक ।
SR No.003449
Book TitleAgam 09 Ang 09 Anuttaropapatik Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shreechand Surana
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages134
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Principle, & agam_anuttaropapatikdasha
File Size3 MB
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