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________________ ४० अनुत्तरोपपातिकदशा से तेणद्वेणं सेणिया ! एवं वुच्चइ इमासिं चउदसण्हं समणसाहस्सीणं धण्णे अणगारे महादुक्करकारए महाणिज्जरयराए चेव। उस काल और उस समय में राजगृह नामका नगर था। गुणशिलक चैत्य था। श्रेणिक वहाँ का राजा था। उस काल और उस समय में श्रमण भगवान् महावीर पधारे। परिषदा निकली। राजा श्रेणिक भी निकला। धर्मकथा हुई। परिषदा वापिस चली गई। अनन्तर उस श्रेणिक राजा ने श्रमण भगवान् महावीर के सान्निध्य में धर्म को सुनकर, विचार कर श्रमण भगवान् महावीर को वन्दन किया,नमस्कार किया। वन्दन नमस्कार करके, भगवान् से इस प्रकार कहा भंते ! आपके इन इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में कौन अनगार महादुष्करकारक है, एवं महानिर्जराकारक है ? भगवान् ने उत्तर दिया श्रेणिक ! इन इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार ही महादुष्करकारक है और महानिर्जराकारक है। __ श्रेणिक ने पुनः प्रश्न किया-भंते ! किस दृष्टि से आपने यह कहा कि इन इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार ही महादुष्करकारक है, महानिर्जराकारक है। उत्तर में भगवान् ने इस प्रकार कहा—श्रेणिक ! उस काल और उस समय में काकन्दी नाम की नगरी थी। यावत् वहाँ ऊँचे महलों में धन्यकुमार भोगों में लीन था। अनन्तर मैं अनुक्रम से चलता हुआ, एक ग्राम से दूसरे ग्राम में विहार करता हुआ, जहाँ काकन्दी नगरी थी और जहाँ पर सहस्राम्रवन उद्यान था वहाँ आया। आकर यथाप्रतिरूप (साधुजनोचित) स्थान की याचना की। संयम यावत तप से भावित होकर रहा। परिषदा निकली, धन्यकुमार प्रव्रजित हुआ। यावत् वह अनासक्ति से आहार करता था। धन्य अनगार के पैर से लेकर मस्तक तक सारे शरीर का वर्णन पूर्ववत् भगवान् ने श्रेणिक को कह सुनाया, ऐसा समझ लेना चाहिए, यावत् वह तप के प्रखर तेज से सुशोभित हो रहा है। श्रेणिक ! इस दृष्टि से मैं यह कहता हूँ कि इन इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार महादुष्करकारक है और महानिर्जराकारक है। श्रेणिक द्वारा धन्य मुनि की स्तुति १७–तए णं से सेणिए राया समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए एयमटुं सोच्चा मिसम्म हट्ठ जाव[तुढे] समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिण-पयाहिणं करेइ, करित्ता, वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता जेणेव धण्णे अणगारे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता धण्णं अणगारे तिक्खुत्तो आयाहिणपायाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी "धण्णे सि णं तुमं देवाणुप्पिया! सुपुण्णे सुकयत्थे कयलक्खणे सुलद्धे णं देवाणुप्पिया! तव माणुस्सए जम्मजीवियफले"-त्ति कट्ट वंदइ, नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता जामेव
SR No.003449
Book TitleAgam 09 Ang 09 Anuttaropapatik Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shreechand Surana
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages134
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Principle, & agam_anuttaropapatikdasha
File Size3 MB
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