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________________ तृतीय वर्ग] [५७ अरहा अरिट्ठनेमी तेणामेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अरहं अरिट्ठनेमिं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ, णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता अरहओ अरि?णेमिस्स णच्चासन्ने णाइदूरे सुस्सूसमाणे नमसमाणे पंजलिउडे अभिमुहे विणएणं] पज्जुवासइ। तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य भाग से होते हए निकले. [निकलकर जहां महत्रामवन उद्यान था और भगवान अरिष्टनेमि थे.वहाँ आये।आकर अरिहंत अरिष्टनेमि स्वामी के छत्र पर छत्र और पतकाओं पर पताका आदि अतिशयों को देखा तथा विद्याधरों चारण मनियों और जंभक देवों को नीचे उतरते हुए एवं ऊपर उठते हुए देखा। देखकर पांच प्रकार के अभिगम करके अरिहंत अरिष्टनेमि स्वामी के सन्मुख चले। वे पांच अभिगम इस प्रकार हैं - (१.) पुष्प-पान आदि सचित्त द्रव्यों का त्याग, (२) वस्त्र-आभूषण आदि अचित्त द्रव्यों का अत्याग, (३) एक शाटिका (दुपट्टे) का उत्तरासंग, (४) भगवान् पर दृष्टि पड़ते ही दोनों हाथ जोड़ना और (५) मन को एकाग्र करना। ये अभिग्रह करके जहां अर्हत् भगवान् अरिष्टनेमि थे वहां आये। आकर अरिहंत अरिष्टनेमि को दक्षिण दिशा से आरम्भ करके (तीन बार) प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा करके भगवान् को स्तुतिरूप वन्दन किया और नमस्कार किया। वन्दननमस्कार करके भगवान् के अत्यन्त समीप नहीं और अत्यन्त दूर भी नहीं, ऐसे समुचित स्थान पर बैठकर, धर्मोपदेश सुनने की इच्छा करते हुए, नमस्कार करते हुए, दोनों हाथ जोड़े, सन्मुख रहकर] उपासना करने लगे। धर्मदेशना और विरक्ति __२०–तए णं अरहा अरिट्ठणेमी कण्हस्स वासुदेवस्स गयसुकुमालस्स कुमारस्स तीसे य धम्मं कहेइ, कण्हे पडिगए। तएणं से गयसुकुमाले अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतियं धम्म सोच्चा, [जं नवरं, अम्मापियरं आपुच्छामि जहा मेहो महेलियावज्जं जाव वड्डियकुले] निसम्म हट्ठतुढे अरहं अरिट्ठनेमिं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासीसद्दहामि णं भंते! निग्गंथं पावयणं, पत्तियामि णं भंते! निग्गंथं पावयणं, रोएमि णं भंते! निग्गंथं पावयणं, अब्भुट्टेमिणं भंते! निग्गंथं पावयणं। एवमेयं भंते! तहमेयं भंते! अवितहमेयं भंते! इच्छियमेयं भंते! पडिच्छियमेयं भंते! इच्छिय-पडिच्छियमेयं भंते! से जहेयं तुब्भे वयह! नवरि देवाणुप्पिया! अम्मापियरो आपुच्छामि। तओ पच्छा मुंडे भवित्ता णं अगाराओ अणगारियं पव्वइस्सामि। अहासुहं देवाणुप्पिया! मा पडिबंधं करेहि। तए णं से गयसुकुमाले अरहं अरिटुनेमिं वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता जेणामेव हत्थिरयणे तेणामेव उवागच्छइ, उवागच्छिता हत्थिखंधवरगए महयाभड-चडगर-पहकरेणं बारवईए नयरीए मझमझेणं जेणामेव सए भवणे तेणामेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता हत्थिखंधाओ पच्चोरुहइ, पच्चोरुहित्ता जेणामेव अम्मापियरो तेणामेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अम्मापिऊणं पायवंदणं करेइ, करित्ता एवं वयासी-एवं खलु अम्मयाओ! मए अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतिए धम्मे निसंते, से वि य मे धम्मे इच्छिए पडिच्छिए अभिरुइए। यहां सूत्रकार ने गजसुकुमाल के जीवन को"जहा मेहो"यह कहकर मेघकुमार के समान बताकर आगे 'महेलियावज्ज' पाठ दिया है, जिसका अर्थ होता है महिलारहित या अविवाहित । ज्ञाता० में मेघकुमार को विवाहित व्यक्त किया है। अत: यहाँ प्रस्तुत शब्द से दोनों की स्थिति की विभिन्नता दर्शायी है । यहाँ 'जाव' पाठ की पूर्ति हेतु इस विभिन्नता को दृष्टि में रख कर उपयुक्त पूर्ति-पाठों को नये पैरेग्राफ से शुरू किया गया है।
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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