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________________ तृतीय वर्ग] [४३ संदिसाहि णं देवाणुप्पिया! किं करेमि? किं दलामि? किं पयच्छामि? किं वा ते हिय-इच्छितं।" . तए णं से कण्हे वासुदेवे तं हरिणेगमेसिं देवं अंतिलिक्खपडिवन्नं पासइ, पासित्ता हट्ठतुढे पोसहं पारेइ, पारित्ता करयलपरिग्गहियं] अंजलिं कट्ठ एवं वयासी इच्छामि णं देवाणुप्पिया! सहोदरं कणीयसं भाउयं विदिण्णं। उसी समय वहां श्रीकृष्ण वासुदेव स्नान कर, बलिकर्म कर, कौतुक-मंगल और प्रायश्चित्त कर, वस्त्रालंकारों से विभूषित होकर देवकी माता के चरण-वंदन के लिये शीघ्रतापूर्वक आये। वे कृष्ण वासुदेव देवकी माता के दर्शन करते हैं, दर्शन कर देवकी के चरणों में वंदन करते हैं। चरणवन्दन कर देवकी देवी से इस प्रकार पूछने लगे "हे माता! पहले तो मैं जब-जब आपके चरण-वन्दन के लिये आता था, तब-तब आप मुझे देखते ही हृष्ट तुष्ट यावत् आनंदित हो जाती थीं, पर माँ! आज आप उदास, चिन्तित यावत् आर्तध्यान में निमग्न-सी क्यों दिख रही हो?" कृष्ण द्वारा इस प्रकार का प्रश्न किये जाने पर देवकी देवी कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहने लगी- हे पुत्र! वस्तुतः बात यह है कि मैंने समान आकृति यावत् समान रूप वाले सात पुत्रों को जन्म दिया। पर मैंने उनमें से किसी एक के भी बाल्यकाल अथवा बाल लीला का सुख नहीं भोगा। पुत्र ! तुम भी छह छह महीनों के अन्तर से मेरे पास चरण-वंदन के लिये आते हो। अत: मैं ऐसा सोच रही हूँ कि वे माताएं धन्य हैं, पुण्यशालिनी हैं जो अपनी सन्तान को स्तनपान कराती हैं, यावत् उनके साथ मधुर आलाप-संलाप करती हैं, और उनकी बालक्रीडा के आनन्द का अनुभव करती हैं। मैं अधन्य हूँ अकृतपुण्य हूँ। यही सब सोचती हुई मैं उदासीन होकर इस प्रकार का आर्तध्यान कर रही हूँ। माता की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण वासुदेव देवकी महारानी से इस प्रकार बोले -"माताजी! आप उदास अथवा चिन्तित होकर आर्तध्यान मत करो। मैं ऐसा प्रयत्न करूंगा जिससे मेरा एक सहोदर छोटा भाई उत्पन्न हो।" इस प्रकार कह कर श्रीकृष्ण ने देवकी माता को इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ वचनों द्वारा धैर्य बंधाया, आश्वस्त किया। इस प्रकार अपनी माता को आश्वस्त कर श्रीकृष्ण अपनी माता के प्रासाद से निकले, निकलकर जहां पौषधशाला थी वहां आये। आकर जिस प्रकार अभयकुमार ने अष्टमभक्त तप (तेला) स्वीकार करके अपने मित्र देव की आराधाना की थी, उसी प्रकार श्रीकृष्ण वासुदेव ने भी की। विशेषता यह कि इन्होंने हरिणैगमेषी देव की आराधना की। आराधना में अष्टम भक्त तप ग्रहण किया, ग्रहण करके पौषधशाला में पौषधयुक्त होकर, ब्रह्मचर्य अंगीकार करके, मणि-सुवर्ण आदि के अलंकारों का त्याग करके, माला, वर्णक और विलेपन का त्याग, करके, शस्त्र-मूसल आदि अर्थात् समस्त आरम्भ- समारम्भ को छोड़कर एकाकी होकर, डाभ के संथारे पर स्थित होकर, तेला की तपस्या ग्रहण करके, हरिणैगमेषी देव का मन में पुनः पुनः चिन्तन करने लगे। __तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव का अष्टम भक्त तप प्रायः पूर्ण होने आया, तब हरिणैगमेषी देव का आसन चलायमान हुआ। अपने आसन को चलित हुआ देखकर उसने अवधिज्ञान का उपयोग लगाया। तब हरिणैगमेषी देव को इस प्रकार का यह आन्तरिक विचार उत्पन्न होता है - "जम्बूद्वीप नामक द्वीप में, भारतवर्ष में दक्षिणार्ध भरत में द्वारका नगरी में, पौषधशाला में, कृष्ण वासुदेव अष्टमभक्त ग्रहण करके मन में पुनः पुनः मेरा स्मरण कर रहा है, अतएव मुझे कृष्ण वासुदेव के समीप प्रकट होना (जाना) योग्य है।" देव इस प्रकार विचार करके उत्तरपूर्व दिग्भाग (ईशान कोण) में जाता है और वैक्रियसमुद्घात करता है
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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