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________________ तृतीय वर्ग ] [ ३५ ...... धम्मियं जाणप्पवरं जुत्तामेव उवट्ठवेह, उवट्ठवेत्ता मम एयमाणित्तयं पच्चाप्पिणह । तए णं ते कोडुंबिय पुरसा एवं वुत्ता समाणा हट्ठ जाव हियया, करयल एवं तहत्तिआणाए विणणं वयणं जाव पडिसुणेत्ता खिप्पामेव लहुकरणजुत्त जाव धम्मियं जाणप्पवरं जुत्तामेव ] उवट्ठवेंति । जहा देवाणंदा जाव [ तए णं सा देवई देवी अंतो अंतेउरंसि ण्हाया, कयबलिकम्मा, कयकोउय-मंगलपायच्छित्ता, किंच वरपायपत्तणेउर- मणिमेहला हार - रचिय उचियकडगखुड् डागए-गावलीकंठसुत्त- उरत्थगेवेज्ज-सोणिसुत्तग- णाणामणि- रयण-भूसणविराइयंगी, चीणंसुयवत्थपवर-परिहिया, दुगुल्लसुकुमालउत्तरिज्जा, सव्वोउयसुरभिकु सुमवरियसिरिया, वरचंदणवंदिया, वराभरण-भूसियंगी, कालागरु धूवधूविया, सिरिसमाणवेसा, जाव अप्पमहग्घाभरणलंकियसरीरा, बहूहिं खुज्जाहिं, चिलाइयाहिं, णाणादेस - विदेसपरिमंडियाहिं, सदेसणेवत्थगहियवेसाहिं, इंगिय- चिंतिय-पत्थियवियाणि - याहिं, कुसलाहिं, विणीयाहिं, चेडियाचक्क वालवरिसधर-थेरकं चुइज्ज- महत्तरगवंदपरिक्खित्ता अंतेउराओ णिग्गच्छइ, णिग्गच्छित्ता जेणैव बाहिरिया उवट्ठाणसाला, जेणेव धम्मिए जाणप्पवरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता जाव धम्मियं जाणप्पवरं दुरूढा । ...... तणं सा देवई देवी धम्मियाओ जाणप्पवराओ पच्चोरुहइ, पच्चोरुहित्ता बहूहिं खुज्जाहिं जाव महत्तरगवंदपरिक्ख़ित्ता भगवं अरिट्ठनेमिं पंचविहे अभिगमेणं अभिगच्छइ, तं जहासचित्ताणं दव्वाणं विउसरणयाए, अचित्ताणं दव्वाणं अविमोयणयाए, विणयोणयाए गायलट्ठीए, चक्खुप्फासे अंजलिपग्गहेणं, मणस्स एगत्तीभावकरणेणं; जेणेव भगवं अरिट्ठनेमी तेणेव उवागच्छइ; उवागच्छित्ता भगवं अरिट्ठनेमिं तिक्खुत्तो आयाहिण -पयाहिणं करेइ, करिता वंदन णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता सुस्सूसमाणी, णमंसमाणी, अभिमुहा विणएणं पंजलिउडा जाव] पज्जुवासइ । तणं अरहा अरिट्ठनेमी देवई देविं एवं वयासी -' से नूणं तव देवई ! हमे छ अणगारे पासित्ता अय़मेयारूवे अज्झत्थिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पण्णे - एवं खलु अहं पोलासपुरे नयरे अइमुत्तेणं जाव' तं णिग्गच्छसि, णिग्गच्छित्ता जेणेव मम अंतियं तेणेव हव्वमागया, से नूणं देवई! अट्ठे समट्ठे ?' 'हंता अत्थि ।' इस प्रकार की बात कहकर उन श्रमणों के लौट जाने के पश्चात् देवकी देवी को इस प्रकार आध्यात्मिक, चिन्तित, प्रार्थित, मनोगत और संकल्पित विचार उत्पन्न हुआ कि " पोलासपुर नगर में अतिमुक्तकुमार नामक श्रमण ने मुझे बचपन में इस प्रकार कहा था - हे देवानुप्रिये देवकी! तुम आठ पुत्रों को जन्म दोगी, जो परस्पर एक दूसरे से पूर्णत: समान [आकार, त्वचा और अवस्था वाले, नीलकमल, महिष के शृंग के अन्तर्वर्ती भाग, गुलिका-रंग विशेष और अलसी के पुष्प समान वर्ण वाले, श्रीवत्स से अंकित वक्ष वाले, कुसुम के समान कोमल और कुंडल के समान घुंघराले बालों वाले] नलकूबर के समान प्रतीत होंगे। भरतक्षेत्र में दूसरी कोई माता वैसे पुत्रों को जन्म नहीं देगी। पर वह कथन मिथ्या निकला, क्योंकि प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है कि अन्य माताओं ने भी ऐसे यावत् पुत्रों को जन्म दिया है। अतः अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान् की सेवा में जाऊं, वंदन-नमस्कार करूं और वंदन-नमस्कार करके इस प्रकार के उक्तिवैपरीत्य के विषय में पूछूं । १. प्रस्तुत सूत्र में ऊपर देखिए ।
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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