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तृतीय वर्ग]
[३१ प्रव्रजित हुए, उसी दिन अरिहंत अरिष्टनेमि को वंदना नमस्कार कर इस प्रकार बोले
'हे भगवन् ! हम चाहते हैं कि आपकी आज्ञा पाकर हम जीवन पर्यन्त निरन्तर बेले-बेले तप द्वारा आत्मा को भावित (शुद्ध) करते हुए विचरण करें।'
अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा-देवानुप्रियो ! जैसे तुम्हें सुख हो, वैसा करो, शुभ कर्म करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए।
तब भगवान् के ऐसा कहने पर वे छहों मुनि भगवान् अरिष्टनेमि की आज्ञा पाकर जीवन भर के लिये बेले-बेले की तपस्या करते हुए यावत् विचरण करने लगे। छहों अनगारों का देवकी के घर में प्रवेश
७-तए णं ते छ अणगारा अण्णया कयाई छट्ठक्खमणपारणयंसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेंति, जहा गोयमो जाव[बीयाए पोरिसीए झाणं झियायंति, तइयाए पोरिसीए अतुरियमचवलमसंभंता मुहपोत्तियं पडिलेहंति, पडिलेहित्ता भायण-वत्थाई पडिलेहंति, पडिलेहित्ता भायणाई पमन्जंति, पमज्जित्ता भायणाई उग्गाहेति, उग्गाहित्ता जेणेव अरहा अरिट्ठनेमी तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छित्ता अरहं अरिट्ठनेमिं वंदंति नमसंति, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-]
. इच्छामो णं भंते! छट्ठक्खमणस्स पारणए तुब्भेहिं अब्भणुण्णाया समाणा तिहिं संघाडएहिं बारवईए नयरीए जाव [ उच्च-नीय-मज्झिमाइं कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए] अडित्तए।
तए णं ते छ अणगारा अरहया अरिटुणेमिणा अब्भणुण्णाया समाणा अरहं अरिट्ठनेमिं वंदंति नमसंति, वंदित्ता नमंसित्ता अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतियाओ सहसंबवणाओ पडिनिक्खमंति, पडिनिक्खमित्ता तिहिं संघाडएहिं अतुरियम जाव[चवलमसंभंता जुगंतरपलोयणाए दिट्ठीए पुरओरियं सोहेमाणा-सोहेमाणा जेणेव बारवई नयरी तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छित्ता बारवईए नयरीए उच्चनीय-मज्झिमाइं कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खायरियं] अडंति।
तदनन्तर उन छहों मुनियों ने अन्यदा किसी समय, बेले की तपस्या के पारणे के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय किया और गौतम स्वामी के समान (दूसरे प्रहर में ध्यानारूढ हुए, तीसरे पहर में कायिक और मानसिक चपलता से रहित हो कर मुखवस्त्रिका, भाजन तथा वस्त्रों की प्रतिलेखना की। तत्पश्चात् वे पात्रों को झोली में रखकर और झोली को ग्रहण कर भगवान अरिष्टनेमि स्वामी की सेवा में उपस्थित होते हैं. वन्दना-नमस्कार करते हैं, तदनन्तर निवेदन करते हैं)-.
भगवन् ! हम बेले की तपस्या के पारणे में आपकी आज्ञा लेकर दो-दो के तीन संघाड़ों से द्वारका नगरी में यावत् [साधुवृत्ति के अनुसार धनी-निर्धन आदि सभी घरों में] भिक्षा हेतु भ्रमण करना चाहते हैं।
तब उन छहों मुनियों ने अरिहंत अरिष्टनेमि की आज्ञा पाकर प्रभु को वंदन नमस्कार किया। वंदन नमस्कार कर वे भगवान् अरिष्टनेमि के पास से सहस्राम्रवन उद्यान से प्रस्थान करते हैं। फिर वे दो दो के तीन संघाटकों में सहज गति से यावत् [चपलता तथा संभ्रान्ति से रहित, चार हाथ प्रमाण भूमि को देखते हुए, ईर्यासमिति का पालन करते हुए, जहाँ द्वारका नगरी थी, वहाँ आते हैं। वहाँ आकर द्वारका नगरी में