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________________ २४] [अन्तकृद्दशा तब अनीयसकुमार बहत्तर कलाओं में पंडित हो गया। उसके नौ अंग-दो कान, दो नेत्र, दो नासिका, जिह्वा, त्वचा और मन बाल्यावस्था के कारण जो सोये-से थे- अव्यक्त चेतना वाले थे, वे जागृत से हो गये। वह अठारह प्रकार की देशी भाषाओं में कुशल हो गया। वह गीति में प्रीति वाला, गीत और नृत्य में कुशल हो गया। वह अश्वयुद्ध, गजयुद्ध, रथयुद्ध और बाहुयुद्ध करने वाला बन गया। अपनी बाहुओं से विपक्षी का मर्दन करने में समर्थ हो गया। भोग भोगने का सामर्थ्य उसमें आ गया। विवेचन-प्रस्तुत सूत्र में अनीयसकुमार के शैशव तथा शैक्षणिक जीवन का उल्लेख करके अब सूत्रकार उसके अग्रिम जीवन का वर्णन करते हुए कहते हैं - ३-तए णं तं अणीयसं कुमारं उम्मुक्कबालभावं जाणित्ता अम्मापियरो सरिसियाणं [सरिव्वयाणं सरित्तयाणं सरिसलावण्ण-रूव-जोव्वण-गुणोववेयाणं सरिसएहिंतो इब्भकुलेहितो आणिल्लियाणं] बत्तीसाए इब्भवरकण्णगाणं एगदिवसेणं पाणिं गेण्हावेंति। तए णं से नागे गाहावई अणीयसस्स कुमारस्स इमं एयारूवं पीइदाणं दलयइ, तं जहाबत्तीसं हिरणकोडीओ जहा महाबलस्स जाव [बत्तीसं सुवण्णकोडीओ, मउडे मठडप्पवरे, बत्तीसं कुंडलजुए कुंडलजुयप्पवरे, बत्तीसे हारे हारप्पवरे, बत्तीसं अद्धहारे अद्धहारप्पवरे, बत्तीसं एगावलीओ एगावलिप्पवराओ, एवं मुत्तावलीओ, एवं कणगावलीओ, एवं रयणावलीओ, बत्तीसं कडगजोए कडगजोयप्पवरे, एवं तुडियजोए, बत्तीसं खोमजुयलाई खोमजुयप्पवराई, एवं वडगजुयलाइं, एवं पट्टजुयलाइं, एवं दुगुल्लजुयलाई बत्तीसं सिरीओ, बत्तीसं हिरीओ, बत्तीसं धिईओ, कित्तीओ, बुद्धीओ, लच्छीओ, बत्तीसं णंदाइं, बत्तीसं भद्दाइं, बत्तीसं तले तलप्पवरे, सव्वरयणामए, णियगवरभवणके ऊ बत्तीसं झए झयप्पवरे, बत्तीसं वये वयप्पवरे, दसगोसाहस्सिएणं वएणं, बत्तीसं णाडगाइं णाडगप्पवराई बत्तीसबद्धेणं णाडएणं, बत्तीसं आसे आसप्पवरे, सव्वरयणामए, सिरिघरपडिरूवए, बत्तीसं हत्थी हत्थिप्पवरे सव्वरयणामए सिरिघरपडिरूवए बत्तीसं जाणाइं जाणप्पवराइं, बत्तीसं जुगाइं जुगप्पवराई, एवं सिबियाओ, एवं संदमाणीओ, एवं गिल्लीओ थिल्लीओ, बत्तीसं वियडजाणाई वियडजाणप्पवराई, बत्तीसं रहे पारिजाणिए बत्तीसं रहे संगामिए, बत्तीसं आसे आसप्पवरे, बत्तीसं हत्थी हत्थीप्पवरे, बत्तीसं गामे गामप्पवरे दसकुलसाहस्सिएणं गामेणं, बत्तीसं दासे दासप्पवरे, एवं चेव दासीओ, एवं किंकरे, एवं कंचुइज्जे, एवं वरिसधरे, एवं महत्तरए, बत्तीसं सोवण्णिए, ओलंबणदीवे, बत्तीसं रूप्पामए ओलंबणदीवे, बत्तीसं सुवण्णरूप्पामए ओलंबणदीवे, बत्तीसं सोवण्णिए उक्कंचणदीवे, बत्तीसं पंजरदीवे, एवं चेव तिण्णि वि, बत्तीसं सोवण्णिए थाले, बत्तीसं रुप्पमए थाले, बत्तीसं सुवण्णरूप्पमए थाले, बत्तीसं सोवणियाओ पत्तीओ ३, बत्तीसं सोवणियाइं थासयाई ३, बत्तीसं सोवणियाई मल्लगाई ३, बत्तीसं सोवणियाओ तालियाओ ३, बत्तीसं सोवणियाओ कावइआओ, बत्तीसं सोवण्णिए अवएडए ३, बत्तीसं सोवणियाओ अवयक्काओ ३, बत्तीस सोवण्णिए पायपीढए ३, बत्तीसं सोवाणियाओ भिसियाओ ३, बत्तीसं सोवणियाओ करोडियाओ ३, बत्तीसं सोवण्णिए पल्लंके ३, बत्तीसं सोवणियाओ पडिसेज्जाओ ३, बत्तीसं हंसासणाई, बत्तीसं कोंचासणाई, एवं गरुलासणाई, उण्णयासणाइं, पणयासणाइं, दीहासणाई, भद्दासणाई पक्खासणाइं, मगरासणाइं, बत्तीसं पउमासणाई बत्तीसं दिसासोवत्थियासणाई बत्तीसं तेल्लसमुग्गे, जहा रायप्पसेणइज्जे, जाव बत्तीसं सरिसवसमुग्गे, बत्तीसं खुजाओ, जहा
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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