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________________ तृतीय वर्ग] [७९ तए णं अरहा अरिटुनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी "साहिए णं कण्हा! गयसुकुमालेणं अणगारेणं अप्पणो अटे।" तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्ठनेमिं एवं वयासी-"कहण्णं भंते! गयसुकुमालेणं अणगारेणं साहिए अप्पणो अडे?" तए णं अरहा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा गयसुकुमाले णं अणगारे ममं कल्लं पुव्वावरणहकालसमयंसि वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-'इच्छामि णं जाव' उवसंपज्जित्ता णं विहरइ'।" तए णं तं गयसुकुमालं अणगारं एगे पुरिसे पासइ, पासित्ता आसुरुत्ते जाव सिद्धे। तं एवं खलु कण्हा! गयसुकुमालेणं अणगारेणं साहिए अप्पणो अढे। वृद्ध पुरुष की सहायता करने के अनन्तर कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य में से होते हुए जहाँ भगवन्त अरिष्टनेमि विराजमान थे वहां आ गए। कृष्ण ने दाहिनी ओर से आरंभ करके तीन बार भगवान् की प्रदक्षिणा-परिक्रमा की, वंदन-नमस्कार किया। इसके पश्चात् गजसुकुमाल मुनि को वहाँ न देखकर उन्होंने अरिहंत अरिष्टनेमि से वंदन-नमस्कार करने के बाद पूछा-"भगवन् ! मेरे सहोदर लघुभ्राता मुनि गजसुकुमाल कहां हैं? मैं उनको वन्दना-नमस्कार करना चाहता हूँ।" महाराज कृष्ण के इस प्रश्न का समाधान करते हुए अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा-कृष्ण! मुनि गजसुकुमाल ने मोक्ष प्राप्त करने का अपना प्रयोजन सिद्ध कर लिया है। अरिष्टनेमि भगवान् से अपने प्रश्न का उत्तर सुन कर कृष्ण वासुदेव अरिष्टनेमि भगवान् के चरणों में पुनः निवेदन करने लगे भगवन् ! मुनि गजंसुकुमाल ने अपना प्रयोजन कैसे सिद्ध कर लिया है? महाराज कृष्ण के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए अरिष्टनेमि भगवान् कहने लगे "हे कृष्ण! वस्तुतः कल दिन के अपराह्न काल के पूर्व भाग में गजसुकुमाल मुनि ने मुझे वन्दननमस्कार किया। वन्दन-नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन किया-हे प्रभो! आपकी आज्ञा हो तो मैं महाकाल श्मशान में एक रात्रि की महाभिक्षुप्रतिमा धारण करके विचरना चाहता हूँ। यावत् मेरी अनुज्ञा प्राप्त होने पर वह गजसुकुमाल मुनि महाकाल श्मशान में जाकर भिक्षु की महाप्रतिमा धारण करके ध्यानस्थ खड़े हो गये। इसके बाद गजसुकुमाल मुनि को एक पुरुष ने देखा और देखकर वह उन पर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ। इत्यादि समस्त पूर्वोक्त घटना सुनाकर भगवान् ने अन्त में कहा- इस प्रकार गजसुकुमाल मुनि ने अपना प्रयोजन सिद्ध कर लिया। २६-तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिटुनेमिं एवं वयासी से के णं भंते! से पुरिसे अपत्थियपत्थिए जाव [ दुरंत-पंत-लक्खणे, हीणपुण्णचाउद्दसिए, सिरि-हिरि-धिइ-कित्ति] परिवजिए, जेणं ममं सहोदरं कणीयसं भायरं गजसुकुमालं अणगारं अकाले चेव जीवियाओ ववरोवेइ (ववरोविए)? १. वर्ग ३, सूत्र २१. २. देखिए-सूत्र २२.
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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