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________________ ६०] [अन्तकृद्दशा तए णं से गयसुकुमाले कुमारे अम्मापिउहिं एवं वुत्ते समाणे अम्मापियरं एवं वयासीतहेव णं तं अम्मयाओ! जं णं तुब्भे ममं एवं वयह-"एस णं जाया! निग्गंथे पावयणे सच्चे अणुत्तरे पुणरवि तं चेव जाव तओ पच्छा भुत्तभोगी अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइस्ससि।" एवं खलु अम्मयाओ! निग्गंथे पावयणे कीवाणं कायराणं कापुरिसाणं इहलोगपडिबद्धाणं परलोगनिप्पिवासाणं दुरणुचरे पाययजणस्स, नो चेव णं धीरस्स। निच्छियववसियस्स एत्थ किं दुक्करं करणयाए? तं इच्छामि णं अम्मयाओ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइत्तए] तए णं से कण्हे वासुदेवे इमीसे कहाए लद्धढे समाणे जेणेव गयसुकुमाले तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता गयसुकुमालं आलिंगइ, आलिंगित्ता उच्छंगे निवेसेइ, निवेसेत्ता एवं वयासी-'तुमं ममं सहोदरे कणीयसे भाया। तं मा णं तुमं देवाणुप्पिया! इयाणिं अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतिए मुंडे जाव [भवित्ता अगाराओ अणगारियं] पव्वयाहि। अहण्णं तुमे बारवईए नयरीए महया-महया रायाभिसेएणं अभिसिंचिस्सामि।' तए णं से गयसुकुमाले कण्हेणं वासुदेवेणं एवं वुत्ते समाणे तुसिणीए संचिट्ठइ। तए णं से गयसुकुमाले कण्हं वासुदेवं अम्मापियरो य दोच्चं पि तच्चं पि एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया! माणुस्सया काम [ भोगा असुई वंतासवा पित्तासवा] खेलासवा जाव [सुक्कासवा सोणियासवा दुरूय-उस्सास नीसासा दुरूय-मुत्त-पुरीस-पूय-बहुपडिपुण्णा उच्चार-पासवण-खेल-सिंघाणग-वंत-पित्त-सुक्क-सोणियसंभवा अधुवा अणितिया असासया सडण-पडण-विद्धंसणधम्मा पच्छा पुरं च णं अवस्स] विप्पजहियव्वा भविस्संति, तं इच्छामि णं देवाणुप्पिया! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतिए जाव [ मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं] पव्वइत्तए। ___ उस समय भगवान् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव और गजसुकुमाल कुमार प्रमुख उस सभा को धर्मोपदेश दिया। प्रभु की अमोघ वाणी सुनने के पश्चात् कृष्ण अपने आवास को लौट गये। तदनन्तर गजसुकुमाल कुमार भगवान् श्री अरिष्टनेमि के पास धर्मकथा सुनकर विरक्त होकर बोले- भगवन् ! माता-पिता से पूछकर मैं आपके पास दीक्षा ग्रहण करूँगा। मेघ कुमार की तरह, विशेष रूप से माता-पिता ने उन्हें महिलावर्ज (अविवाहित अवस्था-अर्थात् विवाह और) वंशवृद्धि होने के बाद दीक्षा ग्रहण करने को कहा। [तत्पश्चात् गजसुकुमाल(र) कुमार ने अरिहंत अरिष्टनेमि स्वामी के पास से धर्म-श्रवण करके और उसे हृदय में धारण करके, हृष्ट-तुष्ट होकर अरिहंत अरिष्टनेमि स्वामी को तीन बार दाहिनी ओर से आरम्भ करके प्रदक्षिणा की, प्रदक्षिणा करके वन्दन-नमस्कार किया, वंदन-नमस्कार करके इस प्रकार कहा-"भगवन्! मैं निर्ग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा करता हूँ, उसे सर्वोत्तम स्वीकार करता हूँ। मैं उस पर प्रतीति करता हूँ। मुझे निर्ग्रन्थ-प्रवचन रुचता है, अर्थात् जिनशासन के अनुसार आचरण करने की अभिलाषा करता हूँ। भगवन् ! मैं निर्ग्रन्थप्रवचन को अंगीकार करना चाहता हूँ। भगवन् ! यह ऐसा ही है (जैस आप कहते हैं), यह उसी प्रकार का है, अर्थात् सत्य है । भगवन् ! मैंने इसकी इच्छा की है, पुनः पुनः इच्छा की है, भगवन् ! यह इच्छित और पुनः पुनः इच्छित है। यह वैसा ही है जैसा आप फरमाते हैं । विशेष बात यह है कि, हे देवानुप्रिय ! मैं अपने माता-पिता की आज्ञा ले लूँ, तत्पश्चात् मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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