SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 99
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५८] [उपासकदशांगसूत्र (१) अशन, पान आदि खाद्य-पेय-पदार्थों का त्याग, (२) शरीर की सज्जा, वेशभूषा, स्नान आदि का त्याग, (३) अब्रह्मचर्य का त्याग, (४) समग्र सावद्य-सपाप कार्य-कलाप का त्याग। वैसे पोषधोपवास चाहे जब किया जा सकता है, पर जैन परंपरा में द्वितीया, पंचमी, अष्टमी, एकादशी एवं चतुर्दशी विशिष्ट पर्व-तिथियों के रूप में स्वीकृत हैं। उनमें भी अष्टमी, चतुर्दशी और पाक्षिक विशिष्ट माना जाता है। पोषधोपवास के अतिचारों का स्पष्टीकरण निम्नांकित है __ अप्रतिलेखित-दुष्प्रतिलेखित-शय्यासंस्तार-शय्या का अर्थ पोषध करने का स्थान तथा संस्तार का अर्थ दरी, चटाई आदि सामान्य बिछौना है, जिस पर सोया जा सके। अनदेखे-भाले व लापरवाही से देखे-भाले स्थान व बिछौने का उपयोग करना। अप्रमार्जित-दुष्प्रमार्जित-शय्या-संस्तार-प्रमार्जित न किये हुए-बिना पूंजे अथवा लापरवाही से पूंजे स्थान एवं बिछौने का उपयोग करना। अप्रतिलेखित-दुष्प्रतिलेखित-उच्चार-प्रस्त्रवणभूमि-अनदेखे-भाले तथा लापरवाही से देखेभाले शौच व लघुशंका के स्थानों का उपयोग करना। पोषधोपवास-सम्यक्-अननुपालन-पोषधोपवास का भली-भाँति--यथाविधि पालन न करना। इन अतिचारों से उपासक को बचना चाहिए। यथासंविभाग-व्रत केअतिचार ५६. तयाणंतरं च णं अहासंविभागस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तं जहा-सचित्त-निक्खेवणया, सचित्तपेहणया, कालाइक्कमे, परववएसे, मच्छरिया। तत्पश्चात् श्रमणोपासक को यथासंविभाग-व्रत के पांच अतिचारों को जानना चाहिए, उनका आचरण नहीं करना चाहिए। वे इस प्रकार हैं-- सचित्तनिक्षेपणता, सचित्तपिधान, कालातिक्रम, परव्यपदेश तथा मत्सरिता। विवेचन यथा-संविभाग का अर्थ है, उचित रूप से अन्न, पान, वस्त्र आदि का विभाजन--मुनि अथवा चारित्र-सम्पन्न योग्य पात्र को इन स्वाधिकृत वस्तुओं में से एक भाग देना। इस व्रत का नाम अतिथिसंविभाग भी है, जिसका अर्थ है--जिसके आने की कोई निश्चित तिथि या दिन नहीं, ऐसे साधु या संयमी अतिथि को अपनी वस्तुओं में से देना। गृहस्थ का यह बहुत ही उत्तम व आवश्यक कर्तव्य है। इससे उदारता की वृत्ति विकसित होती है, आत्म-गुण उजागर होते हैं। इस व्रत के जो पांच अतिचार माने गए हैं, उनके पीछे यही भावना है कि उपासक की देने की
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy