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________________ ३०] [उपासकदशांगसूत्र थूलगं पाणाइवायं पच्चक्खाइ, जावजीवाए दुविहं तिविहेणं, न करेमि, न कारवेमि, मणसा वयसा कायसा। तब आनन्द गाथापति ने श्रमण भगवान् महावीर के पास प्रथम या मुख्य स्थूल प्राणातिपात-- स्थूल हिंसा का प्रत्याख्यान--परित्याग किया, इन शब्दों में-- मैं जीवन पर्यन्त दो करण--कृत व कारित अर्थात करना, कराना तथा तीन योग--मन, वचन एवं काया से स्थूल हिंसा का परित्याग करता हूँ अर्थात् मैं मन से, वचन से तथा शरीर से स्थूल हिंसा न करूगां और न कराऊंगा। सत्य व्रत १४. तयाणंतरं च णं थूलगं मुसावायं पच्चक्खाइ, जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि, मणसा वयसा कायसा। तदन्तर उसने स्थूल मृषावाद--असत्य का परित्याग किया, इन शब्दों में-- मैं जीवन भर के लिए दो करण और तीन योग से स्थूल मृषावाद का परित्याग करता हूँ अर्थात् मैं मन से, वचन से तथा शरीर से न स्थूल असत्य का प्रयोग करूंगा और न कराऊंगा। अस्तेय व्रत १५. तयाणंतरं च णं थूलगं अदिण्णादाणं पच्चक्खाइ, जावजीवाए दुविहं तिविहेणं, न करेमि, न कारवेमि, मणसा वयसा कायसा। उसके बाद उसने स्थूल अदत्तादान--चोरी का परित्याग किया। इन शब्दों में-- मैं जीवन भर के लिए दो करण और तीन योग से स्थूल चोरी का परित्याग करता हूं अर्थात् मैं मन से वचन से तथा शरीर से न स्थूल चोरी करूंगा न कराऊंगा। स्वदार-संतोष १६. तयाणंतरं च णं सदार-संतोसिए परिमाणं करेइ, नन्नत्थ एक्काए सिवनंदाए भारियाए, अवसेसं सव्वं मेहुणविहिं पच्चक्खामि। फिर उसने स्वदारसन्तोष व्रत के अन्तर्गत मैथुन का परिमाण किया। इन शब्दों में-- अपनी एकमात्र पत्नी शिवनन्दा के अतिरिक्त अवशेष समग्र मैथुनविधि का परित्याग करता हूं। इच्छा-परिमाण १७. तयाणंतरं च णं इच्छा-विहि-परिमाणं करेमाणे हिरण्णसुवण्णविहिपरिमाणं करेइ, नन्नत्थ चउहिं हिरण्णकोडीहिं निहाणपउत्ताहिं, चउहिं वुडिढ्पउत्ताहिं, चउहिं पवित्थर
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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