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________________ प्रथम अध्ययन : गाथापति आनन्द ] पउत्ताहिं, अवसेसं सव्वं हिरण्णसुवणविहिं पच्चक्खामि । तब उसने इच्छाविधि-- परिग्रह का परिमाण करते हुए स्वर्ण मुद्राओं के विषय में इस प्रकार सीमाकरण किया [ ३१ निधान-निहित चार करोड़ स्वर्ण मुद्राओं, व्यापार प्रयुक्त चार करोड स्वर्ण मुद्राओं तथा घर व घर के उपकरणों में प्रयुक्त चार करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के अतिरिक्त मैं समस्त स्वर्ण मुद्राओं का परित्याग करता हूं । १८. तयाणंतरं चं णं चउप्पयविहिपरिमाणं करेइ, नन्नत्थ चउहिं वएहिं दस गोसाहस्सिएणं वएणं, अवसेसं सव्वं चउप्पयविहिं पच्चक्खामि । फिर उसने चतुष्पद - विधि-- चौपाए पशुरूप संपत्ति के संबंध में परिमाण किया -- दस-दस हजार के चार गोकुलों के अतिरिक्त मैं बाकी सभी चौपाए पशुओं के परिग्रह का परित्याग करता हूं । १९. तयाणंतरं च णं खेत्तवत्थुविहिपरिमाणं करेइ, नन्नथ पंचहिं हलसहिं नियत्तणसइएणं हलेणं अवसेसं सव्वं खेत्तवत्थुविहिं पच्चक्खामि । फिर उसने क्षेत्र -- वास्तु-विधि का परिमाण किया -- सौ निवर्तन (भूमि का एक विशेष माप) के एक हल के हिसाब से पांच सौ हलों के अतिरिक्त मैं समस्त क्षेत्र - - वास्तुविधि का परित्याग करता हूं । विवेचन खेत (क्षेत्र) का अर्थ खेत या खेती करने की भूमि अर्थात् खुली उघाड़ी भूमि है । प्राकृत का वत्थु शब्द संस्कृत में वस्तु भी हो सकता है, वास्तु भी । वस्तु का अर्थ चीज अर्थात बर्तन, खाट, टेबल, कुर्सी, कपड़े आदि रोजाना काम में आनेवाले उपकरण हैं । वास्तु का अर्थ भूमि, बसने की जगह, मकान या आवास है। यहाँ वत्थु का तात्पर्य गाथापति आन्नद की मकान आदि संबंधी भूमि से है । आनन्द की खेती की जमीन के परिमाण के सन्दर्भ में यहाँ नियत्तण-सइएणं (निवर्तनशतिकेन) पद का प्रयोग करते हुए सौ निवर्तनों की एक इकाई को एक हल की जमीन कहा गया है, जिसे आज की भाषा में बीघा कहा जा सकता है। प्राचीन काल में निवर्तन भूमि के एक विशेष माप के अर्थ मे प्रयुक्त रहा है। बीस बांस या दो सौ हाथ लम्बी-चौड़ी (२०० × २०० = ४००० वर्ग हाथ) भूमि को निवर्तन कहा जाता था । २०. तयाणंतरं च णं सगडविहिपरिमाणं करेइ, नन्नत्थ पंचहिं सगडसएहिं दिसायत्तिएहिं, पञ्चहिं सगड-सएहिं संवाहणिएहिं, अवसेसं सव्वं सगडविहिं पच्चक्खामि। तत्पश्चात् उसने शकटविधि -- गाड़ियों के परिग्रह का परिमाण किया -- १. संस्कृत - - इंगलिश डिक्शनरी : सर मोनियर विलियम्स, पृष्ठ ५६०
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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