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[उपासकदशांगसूत्र
निरर्थक प्रवृत्ति का त्याग, २ दिग्वत--विभिन्न दिशाओं में जाने के सम्बन्ध में मर्यादा या सीमाकरण, ३. उपभोग-परिभोग-परिमाण--उपभोग जिन्हें अनेक बार भोगा जा सके, ऐसी वस्तुएं--जैसे वस्त्र आदि तथा परिभोग जिन्हें एक ही बार भोगा जा सके--जैसे भोजन आदि--इनका परिमाण--सीमाकरण। ४ शिक्षाव्रत इस प्रकार हैं--१. सामायिक--समता या समत्वभाव की साधना के लिए एक नियत समय
न्यनतम एक महर्त--४८ मिनट] में किया जाने वाला अभ्यास, २. देशावकासिक--नित्य प्रति अपनी प्रवृत्तियों में निवृत्ति-भाव की वृद्धि का अभ्यास ३. पोषधोप-वास--अध्यात्म-साधना में अग्रसर होने के हेतु यथाविधि आहार, अब्रह्मचर्य आदि का त्याग तथा ४. अतिथि-संविभाग--जिनके आने की कोई तिथि नहीं, ऐसे अनिमंत्रित संयमी साधक या साधर्मिक बन्धुओं को संयमोपयोगी एवं जीवनोपयोगी अपनी अधिकृत सामग्री का एक भाग आदरपूर्वक देना, सदा मन में ऐसी भावना बनाए रखना कि ऐसा अवसर प्राप्त हो।
तितिक्षापूर्वक अन्तिम मरण रूप संलेखना-तपश्चरण, आमरण अनशन की आराधनापूर्वक देहत्याग श्रावक की इस जीवन की साधना का पर्यवसान है, जिसकी एक गृही साधक भावना लिए रहता है।
भगवान् ने कहा--आयुष्मन् ! यह गृही साधकों का आचरणीय धर्म है। इस धर्म के अनुसरण में प्रयत्नशील होते हुए श्रमणोपासक--श्रावक या श्रमणोपासिका--श्राविका आज्ञा के आराधक
होते हैं।
तब वह विशाल मनुष्य-परिषद् श्रमण भगवान् महावीर से धर्म सुनकर, हृदय में धारण कर, हृष्ट-तुष्ट--अत्यन्त प्रसन्न हुई, चित्त में आनन्द एवं प्रीति का अनुभव किया, अत्यन्त सौम्य मानसिक भावों से युक्त तथा हर्षातिरेक से विकसित-हृदय होकर उठी, उठकर श्रमण भगवान महावीर को तीन बार आदक्षिण-प्रदक्षिणा, वन्दन-नमस्कार किया, वन्दन-नमस्कार कर उसमें से कई गृहस्थ-जीवन का परित्याग कर मुंडित होकर, अनगार या श्रमण के रूप में प्रव्रजित--दीक्षित हुए। कइयों ने पांच अणुव्रत तथा सात शिक्षाव्रत रूप बारह प्रकार का गहि-धर्म--श्रावक-धर्म स्वीकार किया। शेष परिषद ने श्रमण भगवान् महावीर को वंदन किया, नमस्कार किया, वंदन-नमस्कार कर कहा--भगवन् ! आप द्वारा सुआख्यात-सुन्दर रूप में कहा गया, सुप्रज्ञप्त--उत्तम रीति से समझाया गया, सुभाषित--हृदयस्पर्शी भाषा में प्रतिपादित किया गया, सुविनीत--शिष्यों में सुष्ठ रूप में विनियोजित--अन्तेवासियों द्वारा सहज रूप में अंगीकृत, सुभावित--प्रशस्त भावों से युक्त निर्ग्रन्थ-प्रवचन--धर्मोपदेश अनुत्तर-सर्वश्रेष्ठ है। आपने धर्म की व्याख्या करते हुए उपशम क्रोध आदि के निरोध का विश्लेषण किया। उपशम की व्याख्या करते हुए विवेक--बाह्य ग्रन्थियों के त्याग का स्वरूप समझाया। विवेक की व्याख्या करते हुए आपने विरमण-विरति या निवृत्ति का निरूपण किया। विरमण की व्याख्या करते हुए आपने पाप-कर्म न करने की विवेचना की। दूसरा कोई श्रमण या ब्राह्मण नहीं हैं, जो ऐसे धर्म का उपदेश कर सके। इससे श्रेष्ठ धर्म के उपदेश की तो बात ही कहां ? यों कहकर वह परिषद् जिस दिशा से आई थी, उसी ओर वापस लौट गई। राजा भी लौट गया।