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________________ २६] [उपासकदशांगसूत्र प्रतिपादन करते हैं। सुचीर्ण--सुन्दर रूप में--प्रशस्त रूप में संपादित दान, शील, तप आदि कर्म सुचीर्ण--उत्तम फल देने वाले हैं तथा दुश्चीर्ण--अप्रशस्त-पापमय कर्म अशुभ--दुःखमय फल देने वाले हैं। जीव पुण्य तथा पाप का स्पर्श करता है, बन्ध करता है। जीव उत्पन्न होते है--संसारी जीवों का जन्म-मरण है। कल्याण--शुभ कर्म, पाप--अशुभ कर्म फलयुक्त है, निष्फल नहीं होते ।। प्रकारान्तर से भगवान् धर्म का आख्यान--प्रतिपादन करते हैं --यह निर्ग्रन्थप्रवचन, जिनशासन अथवा प्राणी की अन्तर्वर्ती ग्रन्थियों को छुड़ाने वाली आत्मानुशासनमय उपदेश सत्य है, अनुत्तर-- सर्वोत्तम है, केवल--अद्वितीय है अथवा केवली--सर्वज्ञ द्वारा भाषित है, संशुद्ध--अत्यन्त शुद्ध, सर्वथा निर्दोष है, प्रतिपूर्ण--प्रवचन-गुणों में सर्वथा परिपूर्ण है, नैयायिक--न्याय-संगत है--प्रमाण से अबाधित है तथा शल्य-कर्तन माया आदि शल्य--काटों का निवारक है, यह सिद्धि-कृतार्थता या सिद्धावस्था प्राप्त करने का मार्ग-उपाय है, मुक्ति--कर्म रहित अवस्था या निर्लोभता का मार्ग--हेतु है, निर्याण--पुनः नहीं लौटाने वाले जन्म-मरण के चक्र में नही गिराने वाले गमन का मार्ग है, निर्वाण--सकल संतापरहित अवस्था प्राप्त करने का पथ है, अवितथ--सद्भूतार्थ--वास्तविक, अविसन्धि--विच्छेदरहित तथा सब दुःखों को प्रहीण--सर्वथा क्षीण करने का मार्ग है। इसमें स्थित जीव सिद्धि--प्राप्त करते हैं अथवा अणिमा आदि महती सिद्धियों को प्राप्त करते हैं, बुद्ध-ज्ञानी केवल-ज्ञानी होते है, मुक्त-- भवोपग्राही--जन्म-मरण में लाने वाले कर्मांश में रहित हो जाते है, परिनिवृत होते है-- कर्मकृत संताप से रहित--परम शान्तिमय हो जाते हैं तथा सभी दुःखों का अन्त कर देते हैं । एकार्चा--जिनके एक ही मनुष्य-भव धारण करना बाकी रहा है, ऐसे भदन्त-कल्याणान्वित अथवा निर्ग्रन्थ प्रवचन के भक्त पूर्व कर्मों के बाकी रहने से किन्ही देवलोकों में देव के रूप में उत्पन्न होते हैं। वे देवलोक महर्द्धिक-- विपुल ऋद्धियों से परिपूर्ण, अत्यन्त सुखमय दूरगतिक--दूर गति से युक्त एवं चिरस्थितिक--लम्बी स्थिति वाले होते हैं। वहां देव रूप में उत्पन्न वे जीव अत्यन्त ऋद्धि-सम्पन्न तथा चिर स्थिति--दीर्घ आयुष्य युक्त होते हैं। उनके वक्षस्थल हारों से सुशोभित होते हैं, वे अपनी दिव्य प्रभा से दसों दिशाओं को प्रभासित उद्योतित करते हैं। वे कल्पोपग देवलोक में देव-शय्या से युवा के रूप में उत्पन्न होते हैं। वे वर्तमान में उत्तम देवगति के धारक तथा भविष्य में भद्र--कल्याण--निर्वाण रूप अवस्था को प्राप्त करने वाले होते हैं , असाधारण रूपवान् होते हैं। भगवान् ने आगे कहा--जीव चार स्थानों--कारणों से--नैरयिक--नरकयोनि का आयुष्य बन्ध करते हैं , फलत: वे विभिन्न नरकों में उत्पन्न होते हैं। वे स्थान या कारण इस प्रकार हैं--१. महाआरम्भ--घोर हिसा के भाव व कर्म, २. महापरिग्रह-अत्यधिक संग्रह के भाव व वैसा आचरण, ३. पंचेन्द्रिय-वध--मनुष्य, तिर्यंच--पशु पक्षी आदि पांच इन्द्रियों वाले प्राणियों का हनन तथा ४. मांस-भक्षण। इन कारणों से जीव तिर्यंचयोनि में उत्पन्न होते हैं --१. मायापूर्ण निकृति--छलपूर्ण जालसाजी, २. अलीक वचन-असत्य भाषण, ३. उत्कंचनता--झूठी प्रशंसा या खुशामद अथवा किसी मूर्ख व्यक्ति को ठगने वाले धूर्त का समीपवर्ती विचक्षण पुरूष के संकोच से कुछ देर के लिए निश्चेष्ट रहना या
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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