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________________ आठवां अध्ययन : महाशतक ] [२०१ मासियाए संलेहणाए अप्पाणं झूसित्ता, सढि भत्ताइं अणसणाए छेदेत्ता, आलोइय-पडिक्कते समाहिपत्ते कालमासे कालं किच्चा सोहम्मे कप्पे अरूणवडिंसए विमाणे देवत्ताए उववन्ने। चत्तारि पलिओवमाइं ठिई। महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ। निक्खेवो ॥ सत्तमस्स अंगस्स उवासगदसाणं अज्झयणं समत्तं ॥ यों श्रमणोपासक महाशतक ने अनेक विध व्रत, नियम आदि द्वारा आत्मा को भावित किया-आत्मशुद्धि की। बीस वर्ष तक श्रमणोपासक-श्रावक-धर्म का पालन किया । ग्यारह उपासक-प्रतिमाओं की भली भांति आराधना की। एक मास की संलेखना और साठ भोजन-एक मास का अनशन सम्पन्न कर आलोचना प्रतिक्रमण कर, मरणकाल आने पर समाधिपूर्वक देह-त्याग किया। वह सौधर्म देवलोक में अरुणावतंसक विमान में देव रूप में उत्पन्न हुआ। वहां आयु चार पल्योपम की है। महाविदेह क्षेत्र में वह सिद्ध-मुक्त होगा। ॥ निक्षेप॥ ॥ सातवें अंग उपासकदशा का आठवाँ अध्ययन समाप्त ॥ १. एवं खलु जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्रमस्स अज्झयणस्स अयम> पण्णत्तेत्ति बेमि। २. निगमन-आर्य सुधर्मा बोले-जम्बू ! सिद्धि-प्राप्त भगवान् महावीर ने आठवें अध्ययन का यही अर्थ भाव कहा था, जो मैंने तुम्हें बतलाया है।
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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