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________________ १६६] [उपासकदशांगसूत्र करो, उनसे पांच अणुव्रत तथा सात शिक्षाव्रत रूप बारह प्रकार का श्रावक-धर्म स्वीकार करो। __ २०५. तए णं सा अग्गिमित्ता भारिया सद्दालपुत्तस्स समणोवासगस्स 'तह' त्ति एयमढं विणएण पडिसुणेइ। श्रमणोपासक सकडालपुत्र की पत्नी अग्निमित्रा ने 'आप ठीक कहते है ' यों कहकर विनयपूर्वकअपने पति का कथन स्वीकार किया। २०६. तए णं से सद्दालपुत्ते समणोवासए कोडुम्बियपुरिसे सद्दावेइ, सद्दावेत्ता एवं वयासी-खिप्पामेव, भो देवाणुप्पिया! लहु करण-जुत्त-जोइयं, समखुर-बालिहाणसमलिहिय-सिंगएहिं , जंबूणया-मय-कलाव-जोत्त-पइविसिट्ठएहिं, रययामय-घंटसुत्तरज्जुग-वरकंचण-खइय-नत्था-पग्गहोग्गहियएहिं, नीलुप्पल-कयामेलएहिं, पवर-गोणजुवाणएहिं , नाणा-मणि-कणग-घंटिया-जालपरिगयं, सुजाय-जुग-जुत्त, उज्जुगपसत्थसुविरइय-निम्मियं, पवर-लक्खणोववेयं जुत्तामेव धम्मियं जाण-प्पवरं उवट्ठवेह, उवढेवेत्ता मम एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह। ____ तब श्रमणोपासक सकडालपुत्र ने अपने सेवकों को बुलाया और कहा-देवानुप्रियों! तेज चलने वाले, एक जैसे खूर, पूंछ तथा अनेक रंगों से चित्रित सींग वाले, गले में सोने के गहने और जोत धारण किए, गले से लटकती चाँदी की घंटियों सहित नाक में उत्तम सोने के तारों से मिश्रित पतली सी सूत की नाथ से जुड़ी रास के सहारे वाहकों द्वारा सम्हाले हुए, नीले कमलों से बने आभरणयुक्त मस्तक वाले, दो युवा बैलों द्वारा खींचे जाते, अनेक प्रकार की मणियों और सोने की बहुत-सी घंटियों से युक्त, बढ़िया लकड़ी के एकदम सीधे, उत्तम और सुन्दर बने हुए जुए सहित, श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त धार्मिकधार्मिक कार्यों में उपयोग में आने वाला यानप्रवर-श्रेष्ठ रथ तैयार करों, तैयार कर शीघ्र मुझे सूचना दो। २०७. तए णं ते कोडुंबिय-पुरिसा जाव (सद्दालपुत्तेणं समणोवासएणं एवं वुत्ता समाणा हट्ठतुट्ठचित्तमाणंदिया, पीइमणा, परमसोमणस्सिया, हरिसवसविसप्पमाणहियया, करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कटु ‘एवं सामि!' त्ति आणाए विणएणं वयणं पडिसुणेति, पडिसुणेत्ता खिप्पामेव लहुकरणजुत्तजोइयं जाव धम्मियं जाणप्पवरं उवट्ठवेत्ता तमाणत्तियं) पच्चप्पिणंति। __ श्रमणोपासक सकडालपुत्र द्वारा यों कहे जाने पर सेवकों ने (अत्यन्त प्रसन्न होते हुए, चित्त में आनन्द एवं प्रीति का अनुभव करते हुए, अतीव सौम्य मानसिक भावों से युक्त तथा हर्षातिरेक से विकसित हृदय हो, हाथ जोड़े , सिर के चारों ओर घुमाए तथा अंजलि बांधे 'स्वामी' यों आदरपूर्ण शब्द से सकडालपुत्र को सम्बोधित-प्रत्युत्तरित करते हुए उनका कथन स्वीकृतिपूर्ण भाव से विनय-पूर्वक सुना । सुनकर तेज चलने वाले बैलों द्वारा खींचे जाते उत्तम यान को शीघ्र ही उपस्थित किया। २०८. तए णं सा अग्गिमित्ता भारिया ण्हाया जाव (कयबलिकम्मा, कयकोउय
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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