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________________ ८८] [उपासकदशांगसूत्र संशय उत्पन्न हुआ। वे आनन्द के पास से रवाना हुए। रवाना होकर जहां दूतीपलाश चैत्य था, भगवान् महावीर थे, वहां आए। आकर श्रमण भगवान् महावीर के न अधिक दूर, न अधिक नजदीक गमनआगमन का प्रतिक्रमण किया, एषणीय-अनेषणीय की आलोचना की। आलोचना कर आहार-पानी भगवान् को दिखलाया। दिखलाकर वन्दन-नमस्कार कर वह सब कहा जो भगवान् से आज्ञा लेकर भिक्षा के लिए जाने के पश्चात् घटित हुआ था! वैसा कर वे बोले--मैं इस घटना के बाद शंका, कांक्षा और संशययुक्त होकर श्रमणोपासक आनन्द के यहां से चलकर आपके पास तुरन्त आया हूँ। भगवन् ! उक्त स्थान--आचारण के लिए क्या श्रमणोपासक आनन्द को आलोचना (प्रतिक्रमण निन्दा, गर्दा, निवृत्ति अकरणता-विशुद्धि, यथोचित प्रायश्चित्त तथा तदनुरूप तपःक्रिया) स्वीकार करनी चाहिए या मुझे? श्रमण भगवान् महावीर बोले--गौतम! इस स्थान-आचरण के लिए तुम ही आलोचना करो तथा इसके लिए श्रमणोपासक आनन्द से क्षमा याचना भी। ८७. तए णं से भगवं गोयमे, समणस्स भगवओ महावीरस्स तह त्ति एयमटुं विणएणं पडिसुणेइ, पडिसुणेत्ता तस्स ठाणस्स आलोएइ जाव (पडिक्कमइ, निंदइ, गरिहइ विउट्टइ, विसोहइ, अकरणयाए, अब्भुढेइ अहारिहं पायच्छित्तं तवोकम्मं ) पडिवजइ, आणंदं च समणोवासयं एयमढें खामेइ। । भगवान् गौतम ने श्रमण भगवान् महावीर का कथन, 'आप ठीक फरमाते हैं', यों कहकर विनयपूर्वक सुना। सुनकर उस स्थान-आचरण के लिए आलोचना, (प्रतिक्रमण, निन्दा, गर्हा, निवृति, अकरणता-विशुद्धि, यथोचित प्रायश्चित्त तथा तदनुरूप तपःक्रिया) स्वीकार की एवं श्रमणोपासक आनन्द से क्षमा-याचना की। ८८. तए णं समणे भगवं महावीरे अन्नया कयाइ बहिया जणवय-विहारं विहरइ। तत्पश्चात् श्रमण भगवान् महावीर किसी समय अन्य जनपदों में विहार कर गए। ८९. तए णं से आणंदे समणोवासए बहूहिं सील-व्वएहिं जाव (गुण--वेरमण-- पच्चक्खाण-पोसहोववासेहिं) अप्पाणं भावेता, वीसं वासाई समणोवासग-परियागं पाउणित्ता, एक्कारस य उवासग-पडिमाओ सम्मं काएणं फासित्ता, मासियाए संलेहणाए अत्ताणं झूसित्ता, सर्द्धि भत्ताइं अणसणाए छेदेत्ता, आलोइय-पडिक्कंते, समाहिपते, कालमासे कालं किच्चा, सोहम्मे कप्पे सोहम्मवडिंसगस्स महाविमाणस्स उत्तरपुरथिमेणं अरूणे विमाणे देवत्ताए उववन्ने। तत्थ णं अत्थे-गइयाणं देवाणं चत्तारि पलिओवमाइं ठिई पण्णत्ता। तत्थ णं आणंदस्य वि देवस्स चत्तारि पलिओवमाई ठिई पण्णत्ता। यों श्रमणोपासक आनन्द ने अनेकबिध शीलव्रत [गुणव्रत, विरमण--विरति, प्रत्याख्यान-- त्याग एवं पोषधोपवास द्वारा आत्मा को भावित किया-आत्मा का परिष्कार और परिमार्जन किया। बीस वर्ष तक श्रमणोपासक पर्याय-श्रावक-धर्म का पालन किया, ग्यारह उपासक-प्रतिमाओं का भली-भांति
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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