SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 128
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [८७ प्रथम अध्ययन : गाथापति आनन्द] तवोकम्म) पडिवजिजइ ? नो इणढे समढे। जड़ णं भंते! जिण वयणे संताणं जाव (तच्चाणं, तहियाणं, सब्भूयाण) भावाणं नोआलोइज्जइ जाव (नो पडिक्कमिजइ, नो निंदिज्जइ, नो गरिहिज्जइ, नो विउट्टिज्जइ, नो विसोहिजइ अकरणयाए, नो अब्भुट्ठिजइ अहारिहं पायच्छितं) तवो-कम्मं नो पडिवजिजइ, तं णं भंते! तुब्भे चेव एयस्स ठाणस्स आलोएह जाव (पडिक्कमेह, निंदेह, गरिहेह, विउद्देह, विसोहेह अकरणयाए, अब्भुढेह अहारिहं पायच्छित्तं तवोकम्म) पडिवजह। श्रमणोपासक आनन्द भगवान् गौतम से बोला--भगवन् ! क्या जिन-शासन में सत्य, तत्त्वपूर्ण, तथ्य-यथार्थ, सद्भूत भावों के लिए भी आलोचना (प्रतिक्रमण, निन्दा, गर्हा, निवृत्ति, अकरणताविशुद्धि, यथोचित प्रायश्चित्त, तदनुरूप तपःक्रिया) स्वीकार करनी होती है? गौतम ने कहा--ऐसा नहीं होता। आनन्द बोला--भगवन् ! जिन-शासन में सत्य भावों के लिए आलोचना (प्रतिक्रमण, निन्दा, गर्दा, निवृत्ति, अकरणता-विशुद्धि, यथोचित प्रायश्चित्त तथा तदनुरूप तपःक्रिया) स्वीकार नहीं करनी होती तो भन्ते! इस स्थान-आचरण के लिए आप ही आलोचना (प्रतिक्रमण, निन्दा, गर्दा, निवृत्ति, अकरणता-विशुद्धि यथोचित प्रायश्चित्त तथा तदनुरूप तपःक्रिया) स्वीकार करें। ८६. तए णं से भगवं गोयमे आणंदेणं समणोवासएणं एवं वुत्ते समाणे, संकिए, कंखिए, विइगिच्छा-समावन्ने, आणंदस्स अंतियाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव दुइपल्लासे चेइए, जेणेव समणे भगवं महावीरे, तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स अदूरसामन्ते गमणागमणाए पडिक्कमइ पडिक्कमित्ता एसणमणेसणं आलोएइ, आलोइत्ता भत्तपाणं पडिदंसइ, पडिदंसित्ता समणं भगवं वंदइ नमंसइ, वंदित्ता, नमंसित्ता एवं वयासी-एवं खलु भंते! अहं तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए तं चेव सव्वं कहेइ, जाव तए णं अहं संकिएं, कंखिए, विइगिच्छा-समावन्ने आणंदस्स समणोवासगस्स अंतियाओ पडिणिक्खमामि, पडिणिक्खमित्ता जेणेव इहं तेणेव हव्वमागए, तं णं भंते! किं आणंदेणं समणोवासएणं तस्स ठाणस्स आलोएयव्वं जाव (पडिक्कम्मेयव्वं, निंदेयव्वं, गरिहेयव्वं, विउट्टेयव्वं विसोहेयव्वं अकरणयाए, अब्भुट्टेयव्वं अहारिहं पायच्छित्तं तवो-कम्म) पडिवज्जेयव्वं उदाहु मए? गोयमा! इ समणे भगवं महावीरे भगवं गोयम एवं वयासी--गोयमा! तुमं चेव णं तस्स ठाणस्स आलोएहि जाव पडिवजाहि, आणंदं च समणोवासयं एयमढें खामेहि। श्रमणोपासक आनन्द के यों कहने पर भगवान् गौतम के मन में शंका, कांक्षा, विचिकित्सा१. देखें सूत्र-संख्या ८४
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy