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व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र
२४. धम्मत्थिकाएं णं भंते ! जीवाणं किं पवत्तति ?
गोयमा ! धम्मत्थिकाए णं जीवाणं आगमण -गमण - भासुम्मेस-मणजोग - वइजोगकायजोगा, जे यावन्ने तहप्पगारा चला भावा सव्वे ते धम्मऽत्थिकाए पवत्तंति । गतिलक्खणे णं धम्मत्थिकाए ।
[२४ प्र.] भगवन् ! धर्मास्तिकाय से जीवों की क्या प्रवृत्ति होती है ?
[२४ उ.] गौतम ! धर्मास्तिकाय से जीवों के आगमन, गमन, भाषा, उन्मेष (नेत्र खोलना), मनोयोग, वचनयोग और काययोग प्रवृत्त होते हैं। ये और इस प्रकार के जितने भी चल भाव (गमनशील भाव) हैं वे धर्मास्तिकाय द्वारा प्रवृत्त होते हैं । धर्मास्तिकाय का लक्षण गतिरूप है ।
२५. अहम्मत्थिकाए णं भंते! जीवाणं किं पवत्तति ?
गोयमा ! अहम्मत्थिकाए णं जीवाणं ठाण- निसीयण- तुयट्टण-मणस्स य एगत्तीभावकरणता, जे यावन्ने तहप्पगारा थिरा भावा सव्वे ते अहम्मऽत्थिकाये पवत्तंति । ठाणलक्खणे णं अहम्मत्थिकाए ।
[ २५ प्र.] भगवन् ! अधर्मास्तिकाय से जीवों की क्या प्रवृत्ति होती है ?
[२५ उ.] गौतम ! अधर्मास्तिकाय से जीवों के स्थान ( स्थित रहना), निषीदन (बैठना ), त्वग्वर्त्तन ( करवट लेना, लेटना या सोना) और मन को एकाग्र करना (आदि की प्रवृत्ति होती है ।) ये तथा इस प्रकार के जितने भी स्थिर भाव हैं, वे सब अधर्मास्तिकाय से प्रवृत्त होते हैं । अधर्मास्तिकाय का लक्षण स्थितिरूप है ।
२६. आगासत्थिकाए णं भंते! जीवाणं अजीवाण य किं पवत्तति ?
गोयमा ! आगासऽत्थिकाए णं जीवादव्वाण य अजीवदव्वाण य भायणभू ।
एगेण वि से पुणे, दोहि वि पुण्णे, सयं पि माएजा ।
कोडिसएण वि पुणे, कोडिसहस्सं पि माएजा ॥ १ ॥
'अवगाहणालक्खणे णं आगासत्थिकाए ।
[ २६ प्र.] भगवन् ! आकाशास्तिकाय से जीवों और अजीवों की क्या प्रवृत्ति होती है ?
[ २६ उ.] गौतम ! आकाशास्तिकाय, जीवद्रव्यों और अजीवद्रव्यों का भाजनभूत (आश्रयरूप) होता है। (अर्थात् — आकाशास्तिकाय जीव और अजीवद्रव्यों को अवगाह देता है ।)
(एक गाथा के द्वारा आकाश का गुण बताया गया है — ) अर्थात् — एक परमाणु से पूर्ण या दो परमाणुओं से पूर्ण (एक आकाशप्रदेश में) सौ परमाणु भी समा सकते हैं । सौ करोड़ परमाणुओं से पूर्ण एक आकाशप्रदेश में एक हजार करोड़ परमाणु भी समा सकते हैं।
आकाशास्तिकाय का लक्षण 'अवगाहना' रूप है ।
२७. जीवत्थिकाए णं भंते! जीवाणं किं पवत्तति ?