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________________ जीवों के समूह को भूतग्राम कहते हैं। समवायांग की तरह भवगतीसूत्र१५९ में भी इन भेदों का उल्लेख हुआ है। इन में सात अपर्याप्त हैं और सात पर्याप्त हैं। आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन ये छह पर्याप्तियाँ हैं। पृथ्वी आदि एकेन्द्रिय जीवों में चार पर्याप्तियाँ होती हैं। बेन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय और संमूछिम मनुष्य में पांच पर्याप्तियाँ होती हैं। संज्ञी तिर्यञ्च मनुष्य नारक और देव में छह पर्याप्तियाँ होती हैं। जिस जीव में जितनी पर्याप्तियाँ सम्भव हैं, उन्हें जब तब पूर्ण न कर ले तब तक वह जीव की अपर्याप्त अवस्था है और उन्हें पूर्ण कर लेना पर्याप्त अवस्था है। इस तरह पर्याप्त और अपर्याप्त के मिलाकर चौदह प्रकार किये गये हैं। इस के बाद चौदह पूर्वो का उल्लेख है। पूर्व श्रुत, विज्ञान का असीम कोष है। पर. अत्यन्त परिताप है कि वह कोष श्रमण भगवान् महावीर के पश्चात भयंकर द्वादश वर्षीय दुष्काल के कारण तथा स्मृति दौर्बल्य आदि के कारण नष्ट हो गया। उसके पश्चात् चौहद जीवस्थानों का उल्लेख है। जीवस्थान को ही समयसार१६० में, प्राकृत पंचसंग्रह १६१ व कर्मग्रन्थ १६२ में 'गुणस्थान' कहा है। आचार्य नेमिचन्द्र१६३ ने जीवों को गुण कहा है। चौदह जीवस्थान कर्मों के उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम, आदि भावाभावजनित अवस्थाओं से निष्पन्न होते हैं। परिणाम और परिणामी का अभेदोपचार करने से जीवस्थान को गुणस्थान कहा है। गोम्मटसार'६४ में गुणस्थान को जीव-समास कहते हैं। कर्म के उदय से जो गुण उत्पन्न होते हैं। वह औदयिक हैं। कर्म के उपशम से जो गुण उत्पन्न होते हैं, वह औपशमिक हैं। कर्म के क्षयोपशम से जो गुण उत्पन्न होते हैं, वह क्षायोपशमिक हैं। कर्म के क्षय से उत्पन्न होने वाले गुण क्षायिक हैं । कर्म के उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम के बिना जो गुण स्वभावतः पाये जाते हैं, वे पारिणामिक हैं। इन गुणों के कारण जीव को भी गुण कहा गया है। जीवस्थान को समवायांग के बाद के साहित्य में गुणस्थान कहा गया है। आचार्य नेमिचन्द्र१६६ ने संक्षेप और ओघ ये दो गुणस्थान के पर्यायवाची माने हैं। कर्मग्रन्थ६७ में जिन्हें चौदह जीवस्थान बताया है, उन्हें समवाय में चौदह भूतग्राम की संज्ञा दी गई है। जिन्हें कर्मग्रन्थ में गुणस्थान कहा है, उन्हें समवाय में जीवस्थान कहा है। इस प्रकार कर्मग्रंथ और समवाय में संज्ञा भेद है, अर्थभेद नहीं है। समवायांग में जीवस्थानों की रचना का आधार कर्म-विशुद्धि बताया है। आचार्य अभयदेव१६८ ने गुणस्थानों को मोहनीय कर्मों की विशुद्धि से निष्पन्न बताया है। नेमिचन्द्र ६९ ने लिखा है-प्रथम चार गुणस्थान दर्शनमोह के उदय आदि से होते हैं और आगे के आठ गुणस्थान चारित्रमोह के क्षयोपशम आदि से निष्पन्न होते हैं। शेष दो योग के भावाभाव के कारण। यहाँ पर संक्षेप में गुणस्थानों का स्वरूप उजागर हुआ है। इस तरह चौदहवें समवाय में बहुत ही उपयोगी सामग्री का संयोजन है। पन्द्रहवां व सोलहवां समवायः एक विश्लेषण पन्द्रहवें समवाय में पन्द्रह परम अधार्मिक देव, नमि अर्हत की पन्द्रह धनुष की ऊँचाई, राहू के दो प्रकार, भगवती सूत्र-शतक २५ उद्देश-१, पृ. ३५० १६०. समयसार गाथा ५५ १६१. प्राकृतपंचसंग्रह १/३-५ १६२. कर्मग्रन्थ ४/१ १६३. गोम्मटसार गाथा ७ १६४. गोम्मटसार गाथा १० १६५. पड्खण्डागम धवलावृत्ति, प्रथम खण्ड २-१६-६१ गोम्मटसार गाथा ३ १६७. कर्मग्रन्थ ४-२ १६८. समवायांग वृत्ति पत्र-२६ १६९. गोम्मटसार गाथा १२, १३ [४१] १५९. १६६.
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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