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[Various Topics Explained] [213 605 - The object of pain should be known through these doors: cold, substance, body, state, suffering, assumption, approach, sleep, and wakefulness. ||1|| 606 - Venerable sir! Do the hell beings experience cold pain, hot pain, or both cold and hot pain? Gautama! The hell beings experience cold pain, thus the word pain should be said. Discussion - The object of pain should be known through these doors: cold, etc. The word 'c' read before the word 'cold' in the original text does not indicate the opposite pains. Accordingly, there are three types of pain - cold pain, hot pain, and both cold and hot pain. The hell beings of the lower earths experience only cold pain, and the hell beings of the upper earths experience only hot pain. The living beings of the remaining three realms experience cold pain, hot pain, and both cold and hot pain. The word 'substance' indicates the field, time, and feeling along with the word substance. That is, there are four types of pain - substance pain - which is experienced in relation to the substance of matter, field pain - which is experienced in relation to the field of hell, etc., time pain - which is experienced in relation to the life-time of hell, etc., and is experienced for a fixed period of time. The pain experienced from the arising of karmic pain is called feeling pain. From hell beings to the celestial beings of the Vaimānika realm, all living beings experience all four types of pain. With respect to the door of 'body', pain is said to be of three types - bodily, mental, and both bodily and mental. Some pain is only bodily, some is only mental, and some is related to both. All sentient five-sense beings of the four realms experience all three types of pain. But beings from one-sense to non-sentient five-sense beings experience only bodily pain. With respect to the door of 'state', pain is of three types - state pain, non-state pain, and both state and non-state pain. All worldly beings experience all three types of pain. The word 'suffering' indicates three types of pain - pleasant pain, unpleasant pain, and both pleasant and unpleasant pain. All beings of the four realms experience all three types of pain. Question - What is the difference between the pain mentioned in the previous door and the pleasant-unpleasant pain mentioned in this door? Answer - State-non-state pains occur when state-non-state karmic pain arises. But...
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________________ विविधविषय निरूपण] [२१३ ६०५- सीया य दव्व सारीर साया तह वेयणा भवे दुक्खा । अब्भुवगमवक्कमिया णीयाए चेव अणियाए ॥१॥ वेदना के विषय के शीत, द्रव्य, शारीर, साता, दुःखा, आभ्युपगमिकी, औपक्रमिकी, निदा और अनिदा इतने द्वार ज्ञातव्य हैं ॥१॥ ६०६-नेरइया णं भंते! किं सीतं वेयणं वेयंति, उसिणं वेयणं वेयंति, सीतोसिणं वेयणं वेयंति? गोयमा! नेरइया० एवं चेव वेयणापदं भाणियव्वं । भगवन् ! नारकी क्या शीतवेदना वेदन करते हैं,उष्णवेदना वेदन करते हैं अथवा शीतोष्णवेदना वेदन करते हैं? गौतम ! नारकी शीतवेदना वेदन करते हैं, इस प्रकार से वेदना पद कहना चाहिए। विवेचन- वेदना के विषय में शीत आदि द्वार जानने के योग्य हैं। मूल में शीत पद के आगे पठित 'च' शब्द से नहीं कही गई प्रतिपक्षी वेदनाओं की सूचना दी गई है। तदनुसार वेदना तीन प्रकार की है— शीतवेदना, उष्णवेदना और शीतोष्णवेदना। नीचे की पृथिवियों के नारकी केवल शीतवेदना का ही अनुभव करते हैं और ऊपर की पृथिवियों के नारकी केवल उष्णवेदना का ही अनुभव करते हैं। शेष तीन गति के जीव शीतवेदना का भी, उष्णवेदना का भी, और शीतोष्णवेदना का भी वेदन करते हैं। 'द्रव्य' द्वार में द्रव्य पद के साथ, क्षेत्र, काल और भाव भी सूचित किये गये हैं। अर्थात् वेदना चार प्रकार की है-द्रव्यवेदना-जो पुद्गल द्रव्य के सम्बन्ध से वेदन की जाती है, क्षेत्रवेदना-जो नारक आदि उपपात क्षेत्र के सम्बन्ध से वेदन की जाती है, कालवेदना-जो नारक आदि के आयु-काल के सम्बन्ध से नियत काल तक भोगी जाती है। जो वेदनीय कर्म के उदय से वेदना भोगी जाती है, उसे भाववेदना कहते हैं। नारकों से लेकर वैमानिक देवों तक सभी जीव चारों प्रकार की वेदनाओं को वेदन करते हैं। ' 'शारीर' द्वार की अपेक्षा वेदना तीन प्रकार की कही गई है- शारीरी, मानसी और शारीरमानसी। कोई वेदना केवल शारीरिक होती है, कोई केवल मानसिक होती है और कोई दोनों से सम्बद्ध होती है। सभी संज्ञी पंचेन्द्रिय चारों गति के जीव तीनों ही प्रकार की वेदनाओं को भोगते हैं। किन्तु एकेन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक के जीव केवल शारीरी वेदना को ही भोगते हैं। 'साता' द्वार की अपेक्षा वेदना तीन प्रकार की है – साता वेदना, असाता वेदना और साता-असाता वेदना। सभी संसारी जीव तीनों ही प्रकार की वेदनाओं को भोगते हैं। 'दुःख' पद से तीन प्रकार की वेदना सूचित की गई है -सुखवेदना, दुःखवेदना और सुखदुःखवेदना। सभी चतुर्गति के जीव इन तीनों ही प्रकार की वेदनाओं का अनुभव करते हैं। प्रश्न-पूर्व द्वार में कही सातासात वेदना और इस द्वार में कही सुख-दुःख वेदना में क्या अन्तर उत्तर-साता-असाता वेदनाएं तो साता-असाता वेदनीय कर्म के उदय होने पर होती हैं। किन्तु
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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