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________________ ९२] [समवायाङ्गसूत्र कितनेक भव्यसिद्धिक जीव ऐसे हैं जो तीस भव ग्रहण करके सिद्ध होंगे, बुद्ध होंगे, कर्मों से मुक्त होंगे, परिनिर्वाण को प्राप्त होंगे और सर्व दुःखों का अन्त करेंगे। ॥ त्रिंशत्स्थानक समवाय समाप्त॥ एकत्रिंशत्स्थानक-समवाय २०५–एकत्तीसं सिद्धाइगुणा पण्णत्ता तं जहा-खीणे आभिनिबोहियणाणावरणे १, खीणे सुयणाणावरणे २, खीणे ओहिणाणावरणे ३, खीणे मणपज्जवणाणावरणे ४, खीणे केवलणाणावरणे ५, खीणे चक्खुदंसणावरणे ६, खीणे अचक्खुदंसणावरणे ७, खीणे ओहिदसणावरणे ८,खीणे केवलदसणावरणे ९,खीणे णिद्दा १०,खीणे णिहाणिद्दा ११, खीणे पयला १२, खीणे पयलापयला १३, खीणे थीणद्धी १४, खीणे सायावेयणिज्जे १५, खीणे असायावेयणिज्जे १६,खीणे दंसणमोहणिजे १७,खीणे चरित्तमोहणिज्जे १८,खीणे नेरइआउए २९, खीणे तिरिआउए २०, खीणे मणुस्साउए २१, खीणे देवाउए २२, खीणे उच्चागोए २३, खीणे नीयागोए २४, खीणे सुभणामे २५, खीणे असुभणामे २६, खीणे दाणंतराए २७, खीणे लाभंतराए २८, खीणे भोगंतराए २९, खीणे उवभोगंतराए ३०, खीणे वीरिअंतराए ३१।। सिद्धों के आदि गुण अर्थात् सिद्धत्व पर्याय प्राप्त करने के प्रथम समय में होने वाले गुण इकतीस कहे गये हैं, जैसे-१ क्षीण आभिनिबोधिकज्ञानावरण, २ क्षीण श्रुतज्ञानावरण, ३ क्षीण अवधिज्ञानावरण, ४ क्षीण मनःपर्यवज्ञानावरण, ५ क्षीण केवलज्ञानावरण, ६ क्षीण चक्षुदर्शनावरण,७ क्षीण अचक्षुदर्शनावरण, ८ क्षीण अवधिदर्शनावरण, ९ क्षीण केवलदर्शनावरण, १० क्षीण निद्रा, ११ क्षीण निद्रानिद्रा, १२. क्षीण प्रचला, १३ क्षीण प्रचलाप्रचला, १४ क्षीण स्त्यानर्द्धि, १५ क्षीण सातावेदनीय, १६ क्षीण असातावेदनीय, १७ क्षीण दर्शनमोहनीय, १८ क्षीण चारित्रमोहनीय, १९ क्षीण नरकायु, २० क्षीण तिर्यगायु, २१ क्षीण मनुष्यायु, २२ क्षीण देवायु, २३ क्षीण उच्चगोत्र, २४ क्षीण नीचगोत्र, २५ क्षीण शुभनाम, २६ क्षीण अशुभनाम, २७ क्षीण दानान्तराय, २८ क्षीण लाभान्तराय, २९ क्षीण भोगान्तराय, ३० क्षीण उपभोगान्तराय और ३१ क्षीण वीर्यान्तराय। २०६–मंदरे णं पव्वए धरणितले एक्कत्तीसं जोयणसहस्साई छच्चेव तेवीसे जोयणसए किंचि देसूणे परिक्खेवेणं पण्णत्ते। जया णं सूरिए सव्वबाहिरियं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया णं डहगयस्स मणस्सस्स एक्कत्तीसाए जोयणसहस्सेहिं अहि अएकत्तीसेहिं जोयणसएहिं तीसाए सट्ठिभागे जोयणस्स सूरिए चक्खुप्फासं हव्वमागच्छइ। अभिवड्डिए णं मासे एक्कत्तीसं सातिरेगाइं राइंदियाईराइंदियग्गेणं पण्णत्ते।आइच्चे णं मासे एक्कत्तीसं राइंदियाइं किंचि विसेसूणाई राइंदियग्गेणं पण्णत्ते। मन्दर पर्वत धरती-तल पर परिक्षेप (परिधि) की अपेक्षा कुछ कम इकतीस हजार छह सौ तेईस योजन कहा गया है। जब सूर्य सब से बाहरी मंडल में जाकर संचार करता है, तब इस भरत-क्षेत्र-गत मनुष्य को इकतीस हजार आठ सौ इकतीस और एक योजन के साठ भागों में से तीस भाग (३१८३१३०)
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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