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________________ ६४] [समवायाङ्गसूत्र [संजलणकसाए कोहे,संजलणकसाए माणे,संजलणकसाए माया,संजलणकसाए लोहे ] इत्थिवेदे पुंवेदे णपुंवेदे हासे अरति-रति-भय-सोग-दुगुंछा। जिसने अनन्तानुबन्धी चतुष्क और दर्शनमोहत्रिक (मिथ्यात्व, मिश्र एवं सम्यक्त्वमोहनीय) इन सात प्रकृतियों का क्षय कर दिया है ऐसे क्षायिक सम्यग्दृष्टि अष्टम गुणस्थानवर्ती निवृत्ति बादर संयत के मोहनीय कर्म की इक्कीस प्रकृतियों का सत्त्व कहा गया है। जैसे- १. अप्रत्याख्यान क्रोधकषाय, २. अप्रत्याख्यान मानकषाय,३. अप्रत्याख्यान मायाकषाय, ४. अप्रत्याख्यान लोभकषाय,५.प्रत्याख्यानावरण क्रोधकषाय, ६. प्रत्याख्यानावरण मानकषाय, ७. प्रत्याख्यानावरण मायाकषाय, ८. प्रत्याख्यानावरण लोभकषाय, [९. संज्वलन क्रोधकषाय, १०. सज्वलन मानकषाय, ११. सज्वलन मायाकषाय संज्वलन लोभकषाय] १३. स्त्रीवेद, १४. पुरुषवेद, १५. नपुंसकवेद, १६. हास्य, १७. अरति, १८. रति, १९. भय, २०. शोक और २१. दुगुंछा (जुगुप्सा) १४६-एक्कमेक्काए णं ओसप्पिणीए पंचम-छट्ठाओ समाओ एक्कवीसं एक्कवीसं वाससहस्साइं कालेणं पण्णत्ताओ, तं जहा-दूसमा, दूसमदूसमा, एगमेगाए णं उस्सप्पिणीए पढम-वितिआओ समाओ एक्कवीसं एक्कवीसं वाससहस्साई कालेण पण्णत्ताओ, तं जहादूसमदूसमाए, दूसमाए य। प्रत्येक अवसर्पिणी के पांचवें और छठे आरे इक्कीस-इक्कीस हजार वर्ष के काल वाले कहे गये हैं जैसे-दुःषमा और दुःषम-दुःषमा। प्रत्येक उत्सर्पिणी के प्रथम और द्वितीय आरे इक्कीस-इक्कीस हजार वर्ष के काल वाले कहे गये हैं। जैसे-दु.षम-दुःषमा और दुःषमा। १४७-इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं एक्कवीसं पलिओवमाई ठिई पण्णत्ता। छट्ठीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं एक्कवीसं सागरोवमाइं ठिई पण्णत्ता। असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं एगवीसपलिओवमाई ठिई पण्णत्ता। इस रत्नप्रभा पृथिवी में कितनेक नारकों की स्थिति इक्कीस पल्योपम की कही गई है। छठी तमःप्रभा पृथिवी में कितनेक नारकों की स्थिति इक्कीस सागरोपम कही गई है। कितनेक असुरकुमार देवों की स्थिति इक्कीस पल्योपम कही गई है। १४८-सोहम्मीसाणेसुकप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं एक्कवीसंपलिओवमाइं ठिई पण्णत्ता। आरणे कप्पे देवाणं उक्कोसेणं एक्कवीसं सागरोवमाइं ठिई पण्णत्ता। ___ सौधर्म-ईशान कल्पों में कितनेक देवों की स्थिति इक्कीस पल्योपम कही गई है। आरणकल्प में देवों की उत्कृष्ट स्थिति इक्कीस सागरोपम कही गई है। १४९ - अच्चुते कप्पे देवाणं जहणणेणं एक्कवीसं सागरोवमाई ठिई पण्णत्ता। जे देवा सिरिवच्छं सिरिदामकंडं मल्लं किटं चावोण्णतं अरण्णवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा, तेसि णं देवाणं एक्कवीसं सागरोवमाई ठिई पण्णत्ता। ते णं देवा एक्कवीसाए अद्धमासाणं आणमंति वा, पाणमंति वा, उस्ससंति वा, नीससंति वा। तेसि णं देवाणं एक्कवीसाए वाससहस्सेहिं आहारट्ठे समुप्पज्जइ।
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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