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________________ ६०] [ समवायाङ्गसूत्र ठिई पण्णत्ता । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं एगूणवीसपलिओवमाई ठिई पण्णत्ता । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं एगूणवीसपलिओवमाइं ठिई पण्णत्ता । आणयकप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं उक्कोसेणं एगूणवीससागरोवमाई ठिई पण्णत्ता । इस रत्नप्रभा पृथिवी में कितनेक नारकों की स्थिति उन्नीस पल्योपम कही गई है। कितनेक असुरकुमार देवों की स्थिति उन्नीस पल्योपम कही गई है। सौधर्म - ईशान कल्पों में कितनेक देवों की स्थिति उन्नीस पल्योपम कही गई है। आनत कल्प में कितनेक देवों की उत्कृष्ट स्थिति उन्नीस सागरोपम कही गई है। १३९ - पाणए कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं जहणणेणं एगूणवीससागरोवमाई ठिई पण्णत्ता । जे देवा आणतं पाणतं णतं विणतं घणं सुसिरं इंदं इंदोकंतं इंदुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं एगूणवीससागरोवमाई ठिई पण्णत्ता । ते णं देवा एगूणवीसाए अद्धमासाणं आणमंति वा, पाणमंति वा, उस्ससंति वा नीससंति वा तेसि णं देवाणं एगूणवीसाए वाससहस्सेहिं आहारट्ठे समुप्पज्जइ । संतेगइआ भवसिद्धिया जीवा जे एगूणवीसाए भवग्गहणेहिं सिज्झिस्संति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिव्वाइस्संति सव्वदुक्खाणमंतं करिस्संति । प्राणत कल्प में कितनेक देवों की जघन्य स्थिति उन्नीस सागरोपम कही गई है। वहां जो देव आनत, प्राणत, नत, विनत, घन, सुषिर, इन्द्र, इन्द्रकान्त और इन्द्रोत्तरावतंसक नाम के विमानों में देवरूप से उत्पन्न होते हैं, उन देवों की उत्कृष्ट स्थिति उन्नीस सागरोपम कही गई है। वे देव उन्नीस अर्धमासों (साढ़े नौ मासों) के बाद आन-प्राण या उच्छ्वास - नि:श्वास लेते हैं । उन देवों के उन्नीस हजार वर्षों के बाद आहार की इच्छा उत्पन्न होती है। कितनेक भव्यसिद्धिक जीव ऐसे हैं जो उन्नीस भव ग्रहण करके सिद्ध होंगे, बुद्ध होंगे, कर्मों से मुक्त होंगे, परम निर्वाण को प्राप्त होंगे और सर्व दुःखों का अन्त करेंगे। ॥ एकोनविंशतिस्थानक समवाय समाप्त ॥ विंशतिस्थानक - समवाय १४० - वीसं असमाहिठाणा पणत्ता, तं जहा - दवदवचारि यावि भवइ १, अपमज्जियचारि यावि भवइ २, दुप्पमज्जियचारि यावि भवइ ३, अतिरित्तसेज्जाणिए ४, रातिणियपरिभासी ५, थेरोवघाइए ६, भूओवघाइए ७, संजलणे ८, कोहणे ९, पिट्ठिमंसिए १०, अभिक्खणं अभिक्खणं ओहारइत्ता भवइ ११, णवाणं अधिकरणानं अणुप्पण्णाणं उप्पात्ता भवइ १२, पोराणाणं अधिकरणाणं खामिअ विउसविआणं पुणोदीरेत्ता भवइ १३, ससरक्खपाणिपाए १४, अकालसज्झायकारए यावि भवइ १५, कलहकरे १६, सद्दकरे १७, झंझकरे १६, सूरप्पमाणभोई १९, एसणाऽसमिते आवि भवइ २० । बीस असमाधिस्थान कहे गये हैं। जैसे - १. दव- दव या धप-धप करते हुए जल्दी-जल्दी
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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