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________________ ३८ ] [ समवायाङ्गसूत्र घात मृषाप्रत्ययदंड है। अदत्त वस्तु के आदान से― चोरी के निमित्त से होने वाले जीव - घात को अदत्तादानप्रत्ययदंड कहते हैं । अध्यात्म का अर्थ यहां मन है। बाहरी निमित्त के बिना मन में हिंसा का भावं उत्पन्न होना या शोकादिजनित पीड़ा होना आध्यात्मिकदंड है। अभिमान के निमित्त से होने वाला जीवघात मानप्रत्यय दंड है । मित्रजन - माता पिता आदि का - अल्प अपराध होने पर भी अधिक दंड देना मित्रद्वेषप्रत्ययदंड है । मायाचार करने से उत्पन्न होने वाला मायाप्रत्ययदंड कहलाता है। लोभ के निमित्त से होने वाला लोभप्रत्ययदण्ड कहलाता है । कषाय के अभाव में केवल योग के निमित्त से होने वाला कर्मबन्ध ईर्यापथिक दंड कहलाता है। 1 ८६ – सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु तेरस विमाणपत्थडा पण्णत्ता । सोहम्मवडिंसगे णं विमाणे अद्धते रसजो यणसयसहस्साइं आयामविक्खंभेणं पण्णत्ते । एवं ईसाणवडिं सगे वि । जलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणिआणं अद्धतेरस जाइकुल- कोडीजोणीपमुहसयसहस्साइं पण्णत्ता । सौधर्म - ईशान कल्पों में तेरह विमान - प्रस्तट (प्रस्तार, पटल या पाथड़े) कहे गये हैं। सौधर्मावतंसक विमान अर्ध-त्रयोदश अर्थात् साढ़े बारह लाख योजन आयाम-विष्कम्भ वाला है। इसी प्रकार ईशानावतंसक विमान भी जानना चाहिए । जलचर पंचेन्द्रिय तिर्यंचयोनिक जीवों की जाति कुल-कोटियां साढ़े बारह लाख कही गई हैं। ८७- पाणाउस्स णं पुव्वस्स तेरस वत्थू पण्णत्ता । प्राणायु नामक बारहवें पूर्व के तेरह वस्तु नामक अर्थाधिकार कहे गये हैं । ८८ - गब्भवक्कंतिअपंचिदियतिरिक्खजोणिआणं तेरसविहे पओगे पण्णत्ते, तं जहा - सच्चमणपओगे मोसमणपओगे सच्चामोसमणपओगे असच्चामोसमणपओगे सच्चवइपओगे मोसवइपओगे सच्चामोसवइपओगे असच्चामोसवइपओगे ओरालियसरीकायपओगे ओरालियमीससरीरकायपओगे वेडव्वियसरीरकायपओगे वेडव्वियमीससरीरकायपओगे कम्मइयसरीरकायपओगे । गर्भज पंचेन्द्रिय तिर्यग्योनिक जीवों में तेरह प्रकार के योग या प्रयोग होते हैं। जैसे - सत्यमनःप्रयोग, मृषामनःप्रयोग, सत्यमृषामनः प्रयोग, असत्यामृषामनः प्रयोग, सत्यवचनप्रयोग, मृषावचनप्रयोग, सत्यमृषावचनप्रयोग, असत्यामृषावचनप्रयोग, औदारिकशरीरकायप्रयोग, औदारिकमिश्रशरीरकायंप्रयोग, वैक्रियशरीरकायप्रयोग, वैक्रियमिश्रशरीरकायप्रयोग, और कार्मणशरीरकायप्रयोग । ८९ – सूरमंडलं जोयणेणं तेरसेहिं एगसद्विभागेहिं जोयणस्स ऊणं पण्णत्ते । सूर्यमंडल एक योजन के इकसठ भागों में से तेरह भाग १३ / ६१ से न्यून अर्थात् ४८/६१ योजन के विस्तार वाला कहा गया है। ९०–इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइ आणं नेरइयाणं तेरसपलिओ माई ठिई पण्णत्ता। पंचमीए पुढवीए अत्थेगइआणं नेरइयाणं तेरस सागरोवमाइं ठिई पण्णत्ता । सोहम्मीसाणेसु कप्पे अत्थेग आणं देवाणं तेरस पनिओवमाई ठिई पण्णत्ता ।
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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