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________________ ३४] [समवायाङ्गसूत्र वह साम्भोगिक है और उपर्युक्त मर्यादा का उल्लंघन करने पर वह पूर्वोक्त रीति से विसम्भोगिक हो जाता है। यह उपधि-विषयक सम्भोग-विसम्भोग है। (२) जब तक कोई साधु अन्य सम्भोगिक साधु को श्रुत-विषयक वाचनादि निर्दोष विधि से देता है, तब तक वह साम्भोगिक है और यदि वह उक्त मर्यादा का उल्लंघन कर पार्श्वस्थ आदि साधुओं को तीन बार से अधिक श्रुत की वाचनादि देता है, तो वह पूर्ववत् विसाम्भोगिक हो जाता है। यह श्रुतविषयक सम्भोग-विसम्भोग है। (३) जब तक कोई साधु भक्त-पान विषयक निर्दोष मर्यादा का पालन करता है, तब तक वह साम्भोगिक और पूर्ववत् मर्यादा का उल्लंघन करने पर विसम्भोग के योग्य हो जाता है। यह भक्त-पानविषयक सम्भोग-विसम्भोग है। (४) साधुओं को दीक्षा-पर्याय के अनुसार परस्पर में वन्दना करने और हाथों की अंजलि जोड़कर नमस्कारादि करने का विधान है। जब कोई साधु इसका उल्लंघन नहीं करता है, या पार्श्वस्थ आदि साधुओं की वन्दनादि नहीं करता है, तब तक वह साम्भोगिक है और उक्त मर्यादा का उल्लंघन करने पर वह विसम्भोगिक कर दिया जाता है। यह अंजलिप्रग्रह-विषयक सम्भोग-विसम्भोग है। (५) साधु अपने पास के वस्त्र, पात्रादि को अन्य साम्भोगिक साधु के लिए दे सकता है, या देता है, तब तक वह साम्भोगिक है। किन्तु जब वह अपने वस्त्र-पात्रादि उपकरण उक्त मर्यादा का उल्लंघन कर अन्य विसम्भोगिक या पार्श्वस्थ आदि साधु को देता है तो वह पूर्वोक्त रीति से विसम्भोग के योग्य हो जाता है। यह दान-विषयक सम्भोग-विसम्भोग है। (६) निकाचन का अर्थ निमंत्रण देना है। जब कोई साधु यथाविधि अन्य साम्भोगिक साधु को शुद्ध वस्त्र, पात्र या भक्त-पानादि देने के लिए निमंत्रण देता है, तब तक वह साम्भोगिक है। जब वह मर्यादा का उल्लंघन कर अन्य विसम्भोगिक या पार्श्वस्थ आदि साधु को वस्त्रादि देने के लिए निमंत्रण देता है तो वह पूर्ववत् विसम्भोग के योग्य हो जाता है। यह निकाचन-विषयक सम्भोग-विसम्भोग है। (७) साधु को गुरुजन या अधिक दीक्षापर्यायवाले साधु के आने पर अपने आसन से उठकर उसका यथोचित अभिवादन करना चाहिये। जब कोई साधु इस मर्यादा का उल्लंघन करता है, अथवा पार्श्वस्थ आदि साधु के लिए अभ्युत्थानादि करता है, तब वह पहले कहे अनुसार विसम्भोग के योग्य हो जाता है। यह अभ्युत्थान-विषयक सम्भोग-विसम्भोग है। (८) कृतिकर्म वन्दनादि यथाविधि करने पर साधु साम्भोगिक रहता है और उसकी मर्यादा का उल्लंघन करने पर वह विसम्भोग के योग्य हो जाता है। (९) वैयावृत्त्यकरण-जब तक साधु वृद्ध, बाल, रोगी आदि साधुओं की यथाविधि वैयावृत्त्य करता है तब तक वह साम्भोगिक है। उसकी मर्यादा का उल्लंघन करनेपर वह विसम्भोग के योग्य हो जाता है। (१०) प्रवचन-भवन आदि जिस स्थान पर अनेक साधु एक साथ मिलते और उठते-बैठते हैं,
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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