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________________ धर्म और अधर्म-द्रव्य | २७ धर्म-द्रव्य सहायक होता है, और वहाँ पहुँच कर स्थित होता है, उस गति में अधर्म-द्रव्य सहायक बनता है, और पुद्गलों से मुक्त होकर सदा-सर्वदा के लिए अपने स्वरूप में स्थिर होता है-इस में पुद्गल एवं काल का सहयोग अपेक्षित है। निश्चय-दृष्टि से यह सत्य है, कि मुक्तआत्मा में केवल जीव द्रव्य ही है, परन्तु जिस लोक-आकाश के अग्रभाग पर वे स्थित हैं, वहाँ षड्द्रव्यों का अस्तित्व है ही। इसलिए षड्-द्रव्य के यथार्थ स्वरूप को समझे बिना, व्यक्ति अपने स्वरूप को नहीं समझ सकता है, और अपने स्वरूप अर्थात् जीव-द्रव्य को समझे बिना षड्-द्रव्यों का परिज्ञान नहीं कर सकता। इसलिए आचारांग सूत्र में भगवान् महावीर ने कहा है-जो एक को जानता है, वह सबको जानता है और जो सबको जानता है, वह एक को जानता है "जे एगं जाणइ, से सव्वं जाणइ । जे सव्वं जाणइ, से एगं जाणइ ॥" Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003427
Book TitleJain Darshan ke Mul Tattva
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaymuni Shastri
PublisherDiwakar Prakashan
Publication Year1989
Total Pages194
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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